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    वर्ल्ड अपडेट्स:पाकिस्तान में ईशनिंदा के आरोपी पूर्व सैन्य अधिकारी की मौत की सजा रद्द, कोर्ट ने सबूतों के अभाव में बरी किया

    3 days ago

    पाकिस्तान में ईशनिंदा से जुड़े एक मामले में लाहौर हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने पूर्व सैन्य अधिकारी कर्नल (रिटायर्ड) मोहम्मद आरिफ को दी गई मौत की सजा को रद्द कर दिया और सबूतों के अभाव में उन्हें बरी कर दिया। यह फैसला उस सजा के खिलाफ अपील पर आया है, जो पिछले साल रावलपिंडी की एक सेशंस कोर्ट ने सुनाई थी। कर्नल आरिफ पर पैगंबर के खिलाफ कथित आपत्तिजनक टिप्पणी करने का आरोप लगाया गया था। यह मामला रावलपिंडी के लाल कुर्ती इलाके का है। कर्नल आरिफ के वकील इमरान मलिक के मुताबिक, 2024 में वह अपनी पत्नी के साथ एक रेस्टोरेंट में मौजूद थे। इसी दौरान चार युवकों ने उनकी पत्नी पर आपत्तिजनक टिप्पणियां कीं। जब कर्नल आरिफ ने इसका विरोध किया, तो युवकों ने उनके साथ गाली-गलौज की और बात हाथापाई तक पहुंच गई। वकील के मुताबिक, कर्नल आरिफ ने चेतावनी दी थी कि वह इस घटना की शिकायत सैन्य अधिकारियों से करेंगे। वकील ने बताया कि इन चार में से एक युवक कामरान, प्रतिबंधित कट्टरपंथी संगठन तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान (TLP) का पदाधिकारी था। सैन्य कार्रवाई के डर से इन लोगों ने मामले को धार्मिक रंग दिया और कर्नल आरिफ के खिलाफ ब्लास्फेमी का केस दर्ज करवा दिया। मामले के बाद TLP कार्यकर्ताओं ने उस पुलिस थाने को घेर लिया, जहां कर्नल आरिफ को रखा गया था और उन्हें भीड़ के हवाले करने की मांग की। वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने निष्पक्ष न्याय का भरोसा दिलाया, जिसके बाद भीड़ हट गई। पिछले साल रावलपिंडी की सेशंस कोर्ट ने कर्नल आरिफ को मौत की सजा सुनाई थी। इसके खिलाफ उन्होंने लाहौर हाईकोर्ट में अपील की थी। लाहौर हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच, जिसमें जस्टिस सादिकत अली खान और जस्टिस तारिक बजवा शामिल थे, ने अपील पर सुनवाई की। अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष कोई भी स्वतंत्र गवाह पेश नहीं कर सका, जो आरोपों की पुष्टि कर सके। कोर्ट ने यह भी कहा कि पुलिस ने न तो चश्मदीदों के बयान दर्ज किए और न ही मामले की स्वतंत्र जांच की। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि ट्रायल कोर्ट ने मामले का फैसला करते समय तथ्यों का सही आकलन नहीं किया। इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने मौत की सजा रद्द कर दी और कर्नल आरिफ को बरी कर दिया। अंतरराष्ट्रीय मामलों से जुड़ी अन्य बड़ीं खबरें… ईरान में सुप्रीम लीडर खामेनेई 37 साल पुरानी परंपरा तोड़ी, पहली बार एयर फोर्स कमांडरों की सालाना बैठक में नहीं पहुंचे ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई इस साल 8 फरवरी को हुई वाली एयर फोर्स कमांडरों की वार्षिक बैठक में शामिल नहीं हुए। 1989 में सत्ता संभालने के बाद यह पहला मौका है, जब उन्होंने इस परंपरागत कार्यक्रम में हिस्सा नहीं लिया। ईरान इंटरनेशनल वेबसाइट ने इसकी जानकारी दी है। खामेनेई की जगह रविवार को सशस्त्र बलों के चीफ ऑफ स्टाफ अब्दोलरहीम मौसावी ने सेना की एयर फोर्स के कमांडरों से मुलाकात की। हर साल 8 फरवरी को यह बैठक होती है और इसे ईरान की इस्लामिक क्रांति से जोड़ा जाता है। दरअसल, 8 फरवरी 1979 को ईरानी वायुसेना के कुछ अधिकारियों ने इस्लामिक रिपब्लिक के संस्थापक रुहोल्लाह खुमैनी के प्रति निष्ठा जताई थी। इसके बाद से यह दिन प्रतीकात्मक परंपरा बन गया और हर साल एयर फोर्स के अधिकारी ईरान के सर्वोच्च नेता से इसी तारीख को मुलाकात करते रहे हैं। खामेनेई ने सुप्रीम लीडर बनने के बाद से अब तक इस परंपरा को लगातार निभाया था। यहां तक कि कोविड-19 महामारी के दौरान भी उन्होंने यह बैठक की थी। ऐसे में इस साल उनकी गैरमौजूदगी को असामान्य माना जा रहा है। ईरान और अमेरिका के बीच तनाव बढ़ा हुआ है। अमेरिका ने क्षेत्र में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ाई है और दोनों देशों के बीच परमाणु समझौते को लेकर दबाव भी तेज हो गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने शनिवार को ईरान पर परमाणु समझौता करने का दबाव दोहराया। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर तेहरान ऐसा नहीं करता तो उसे “नतीजे” भुगतने होंगे। ट्रम्प का यह बयान ओमान की राजधानी मस्कट में दोनों देशों के बीच हुई बातचीत के बाद आया। ट्रम्प ने यह भी कहा कि अमेरिका का एक बड़ा बेड़ा ईरान की ओर बढ़ रहा है और दावा किया कि तेहरान समझौते के लिए इच्छुक है। उन्होंने बातचीत को बहुत अच्छी बताते हुए कहा कि इस बार का समझौता पहले से अलग हो सकता है। इसी बीच, ईरान के सुप्रीम लीडर के सलाहकार और नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के सचिव अली लारिजानी मंगलवार को ओमान का दौरा करेंगे। अर्ध-सरकारी तस्नीम न्यूज एजेंसी के मुताबिक, इस दौरे के दौरान वह ओमान के वरिष्ठ अधिकारियों से मुलाकात कर क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय हालात के साथ-साथ द्विपक्षीय सहयोग पर चर्चा करेंगे। एपस्टीन फाइल्स में नाम आने पर नॉर्वे की राजदूत का इस्तीफा, यौन अपराधी से संपर्क को लेकर था विवाद नॉर्वे की राजनयिक और जॉर्डन में तैनात राजदूत मोना यूल ने इस्तीफा दे दिया है। उन पर अमेरिकी यौन अपराधी जेफ्री एपस्टीन से संपर्क को लेकर सवाल उठे थे। नॉर्वे के विदेश मंत्रालय ने रविवार शाम उनके इस्तीफे की पुष्टि की। मामला सामने आने के बाद मोना यूल को कुछ दिन पहले ही जॉर्डन में राजदूत के पद से निलंबित किया गया था। रिपोर्ट्स में दावा किया गया था कि एपस्टीन ने 2019 में जेल में आत्महत्या से पहले बनाई गई वसीयत में यूल और उनके पति के बच्चों के लिए 1 करोड़ डॉलर छोड़े थे। नॉर्वे के विदेश मंत्री एस्पेन बार्थ ईडे ने कहा कि मोना यूल का इस्तीफा सही और जरूरी फैसला है। उन्होंने कहा कि दोषी यौन अपराधी के साथ संपर्क गंभीर निर्णयहीनता को दर्शाता है और ऐसे हालात में राजनयिक पद के लिए जरूरी भरोसा बहाल करना मुश्किल हो जाता है। विदेश मंत्रालय ने साफ किया कि यूल को एपस्टीन के बारे में कितनी जानकारी थी और उनके संपर्क किस तरह के थे, इसकी जांच जारी रहेगी। यूल मंत्रालय के साथ सहयोग करती रहेंगी ताकि पूरे मामले को स्पष्ट किया जा सके। मंत्रालय ने यह भी बताया कि न्यूयॉर्क स्थित थिंक टैंक ‘इंटरनेशनल पीस इंस्टीट्यूट’ को दी गई फंडिंग और उससे जुड़े संपर्कों की समीक्षा शुरू कर दी गई है। यह संस्थान उस समय यूल के पति टेर्ये रोड-लार्सन के नेतृत्व में था। विदेश मंत्री ने कहा कि रोड-लार्सन ने भी एपस्टीन को लेकर खराब निर्णय लिया था। मोना यूल और उनके पति 1990 के दशक में इजराइल-फिलिस्तीन शांति प्रक्रिया से जुड़े ऐतिहासिक ओस्लो समझौते को आगे बढ़ाने वालों में शामिल रहे हैं। पिछले हफ्ते नॉर्वे की समाचार एजेंसी एनटीबी को दिए बयान में यूल ने माना था कि एपस्टीन से संपर्क को कमतर बताना सही नहीं था। उन्होंने कहा कि यह संपर्क उनके पति के जरिए हुआ था और उनका एपस्टीन से कोई स्वतंत्र सामाजिक या पेशेवर रिश्ता नहीं था। यूल के मुताबिक यह संपर्क निजी और कभी-कभार था, आधिकारिक काम का हिस्सा नहीं था, लेकिन उन्होंने माना कि उन्हें ज्यादा सतर्क रहना चाहिए था। हॉन्गकॉन्ग में लोकतंत्र समर्थक मीडिया कारोबारी जिमी लाई को 20 साल की जेल हॉन्गकॉन्ग के लोकतंत्र समर्थक मीडिया कारोबारी जिमी लाई को विदेशी ताकतों से साठगांठ के आरोप में 20 साल जेल की सजा सुनाई गई है। यह सजा शहर के विवादित राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत दी गई है, जिसे चीन ने 2019 के बड़े प्रदर्शनों के बाद लागू किया था। मानवाधिकार संगठनों ने 78 साल के जिमी लाई के लिए इस सजा को मौत की सजा के बराबर बताया है। राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत दी गई यह अब तक की सबसे सख्त सजा मानी जा रही है। चीन का कहना है कि यह कानून शहर की स्थिरता के लिए जरूरी है। यह कानून 2019 में हुए उन व्यापक प्रदर्शनों के बाद लागू किया गया था, जिनमें अधिक स्वतंत्रता की मांग की गई थी। जिमी लाई ब्रिटिश नागरिक हैं और राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत गिरफ्तार किए गए सैकड़ों लोगों में सबसे प्रमुख नाम हैं। वे चीन के मुखर आलोचक रहे हैं और अपने अखबार ‘एप्पल डेली’ को विरोध के मंच के तौर पर इस्तेमाल करते रहे। जिमी लाई के बेटे सेबास्टियन लाई ने BBC से कहा कि यह फैसला “हॉन्गकॉन्ग की कानूनी व्यवस्था के पूर्ण विनाश और न्याय के अंत” का संकेत है। उन्होंने बताया कि उन्होंने ब्रिटेन सरकार के सामने कई बार पिता की कैद का मुद्दा उठाया, लेकिन “वह अब भी जेल में हैं”। सोमवार को ‘एप्पल डेली’ के छह पूर्व अधिकारियों और दो कार्यकर्ताओं को भी राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत 6 साल 3 महीने से लेकर 10 साल तक की सजा सुनाई गई। मामला 2019 के प्रदर्शनों के दौरान अमेरिकी उपराष्ट्रपति और विदेश मंत्री के साथ हुई उनकी बैठक का है। नवंबर में गवाही के दौरान लाई ने कहा था कि उन्होंने कभी भी विदेशी संपर्कों का इस्तेमाल हॉन्गकॉन्ग नीति को प्रभावित करने के लिए नहीं किया, बल्कि सिर्फ हालात की जानकारी दी थी। बांग्लादेश में चुनाव प्रचार के दौरान जमात और BNP कार्यकर्ताओं में हिंसक झड़प, 50 घायल बांग्लादेश के पातुआखाली जिले में चुनाव प्रचार के दौरान जमात-ए-इस्लामी और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) के समर्थकों के बीच हिंसक झड़प हो गई। इस घटना में करीब 50 लोग घायल हो गए, जिनमें दोनों दलों के स्थानीय नेता भी शामिल हैं। यह घटना रविवार को पातुआखाली-2 संसदीय क्षेत्र के अंतर्गत बौफाल उपजिला के चंद्रद्वीप यूनियन में हुई। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, जमात समर्थित उम्मीदवार शफीकुल इस्लाम मसूद के समर्थन में सुबह करीब 10 बजे एक चुनावी जुलूस निकाला गया। जुलूस जब दोपहर करीब 1 बजे भंडारी बाजार इलाके में पहुंचा, तभी पीछे से आए 40 से 50 लोगों के एक समूह ने लाठी और धारदार हथियारों से जुलूस पर हमला कर दिया। हमले में सबसे पहले करीब 40 लोग घायल हुए, जिनमें अधिकतर जमात समर्थक थे। इसके बाद दोनों पक्षों के बीच जवाबी झड़पें हुईं, जिसमें करीब 10 और लोग घायल हो गए। पुलिस और स्वास्थ्य अधिकारियों के मुताबिक, कुल 25 घायलों को अस्पताल में भर्ती कराया गया है। ईरान में नोबेल विजेता को 7 साल की जेल, देश के खिलाफ प्रोपेगेंडा फैलाने का आरोप ईरान की रिवोल्यूशनरी कोर्ट ने नोबेल शांति पुरस्कार विजेता और मानवाधिकार कार्यकर्ता नरगिस मोहम्मदी को सात साल से ज्यादा की जेल की सजा सुनाई है। उनके वकील के मुताबिक उन्हें 'राज्य के खिलाफ साजिश' और 'प्रोपेगेंडा' के मामलों में दोषी ठहराया गया। सजा के साथ दो साल का आंतरिक निर्वासन और यात्रा प्रतिबंध भी लगाया गया है। मोहम्मदी फरवरी से भूख हड़ताल पर हैं। वे 2022 में महसा अमीनी की मौत के बाद हुए विरोध प्रदर्शनों की मुखर समर्थक रही हैं। इससे पहले वे 13 साल सजा काट रही थीं और स्वास्थ्य कारणों से अस्थायी रिहाई पर थीं। मानवाधिकार संगठनों ने सजा की निंदा की है। यह फैसला ऐसे समय आया है जब ईरान अमेरिका से परमाणु कार्यक्रम पर बातचीत कर रहा है। नरगिस मोहम्मदी को साल 2023 में नोबेल पीस प्राइज के लिए चुना गया था। यह पुरस्कार पाने वाली वो ईरान की दूसरी महिला हैं। उनको ईरान में महिलाओं के खिलाफ हो रहे अत्याचार और राजनीतिक कैदियों के साथ किए जा रहे दुर्व्यवहार के खिलाफ लड़ाई लड़ने के लिए यह पुरस्कार दिया गया था। उन्होंने ईरान में मृत्यु दंड के खिलाफ भी आवाज उठाई थी। नोबेल समिति के प्रमुख ने उन्हें ‘स्वतंत्रता सेनानी’ कहा था। जब उन्हें यह प्राइज मिला तब वो तेहरान की एविन जेल के अंदर थी। उनके बच्चों ने यह प्राइज लिया था जो कि पेरिस में रहते है। नरगिस ने अपनी किताब 'व्हाइट टॉर्चर: इंटरव्यूज़ विद ईरानी वुमन प्रिज़नर्स' में अपने और 12 कैदियों के जेल के अनुभव को लिखा हैं। नरगिस मोहम्मदी पिछले 30 सालों से ईरान में मानव अधिकारों की लड़ाई लड़ रही हैं। इस दौरान उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा। वो अभी तक 13 बार गिरफ्तार हो चुकी हैं। पहली बार उन्हें 2011 में हिरासत में लिया था। इसके बाद 2015 में उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा के खिलाफ दुष्प्रचार करने के आरोप में गिरफ्तार कर जंजन की सेंट्रल जेल में रखा गया था। इसके बाद 2020 में नरगिस को सजा कम होने पर रिहा कर दिया था। बांग्लादेश में ढाका सीट से उम्मीदवार का चुनाव लड़ने से इनकार, कहा-इलाका बड़ा है, खर्च ज्यादा हो रहा बांग्लादेश में 12 फरवरी को होने वाले चुनाव से पहले 'नागरिक ओइक्या' पार्टी के नेता महमूदुर रहमान मन्ना ने ढाका-18 सीट से चुनाव न लड़ने का फैसला किया है। उन्होंने कहा कि वह इस सीट से अपना नाम वापस ले रहे हैं। मन्ना ने यह बात सोमवार को द डेली स्टार से बातचीत में कही। उन्होंने अपने फेसबुक पेज पर भी इसकी जानकारी दी। मन्ना ने लिखा कि खास हालात में उन्होंने ढाका-18 और बोगुरा-2, दोनों सीटों से चुनाव लड़ने का सोचा था। उन्होंने बताया कि ढाका-18 सीट बहुत बड़ी है। यहां करीब साढ़े सात थानों का इलाका आता है और लगभग 6 लाख 50 हजार वोटर हैं। मन्ना के मुताबिक, इस सीट पर चुनाव लड़ने में बहुत ज्यादा खर्च आता है, जिसे वह संभाल नहीं पा रहे हैं। इसी वजह से उन्होंने ढाका-18 सीट से चुनाव की दौड़ से हटने का फैसला किया है। उन्होंने कहा कि इस फैसले से अगर किसी को बुरा लगा हो, तो उन्हें इसका अफसोस है। पुतिन से नजदीकी बढ़ाना चाहता था यौन अपराधी एपस्टीन:नए दस्तावेजों से खुलासा, रूस की मदद करने का ऑफर दिया था अमेरिका जस्टिस डिपार्टमेंट (DOJ) के नए दस्तावेजों से खुलासा हुआ है कि यौन अपराधी जेफ्री एपस्टीन रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के करीब जाने की कोशिश कर रहा था। एपस्टीन ने कई मौकों पर पुतिन और उनके करीबी अधिकारियों तक पहुंच बनाने के प्रयास किए। एपस्टीन 2018 में रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव के जरिए पुतिन तक अपनी बात पहुंचाना चाहता था। उसने इसके लिए नॉर्वे के पूर्व पीएम थॉर्बजॉर्न यागलैंड से संपर्क किया था। जून 2018 के एक ईमेल में एपस्टीन ने नॉर्वे के पूर्व पीएम थोर्ब्योर्न यागलैंड से कहा था कि वह पुतिन को यह सुझाव दें कि रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव उससे बातचीत करें। दस्तावेजों के मुताबिक, एपस्टीन खुद को एक ऐसे प्रभावशाली व्यक्ति के तौर पर पेश कर रहा था, जो अंतरराष्ट्रीय राजनीति और निवेश जैसे मुद्दों पर रूस की मदद कर सकता है। पढ़ें पूरी खबर… जापान चुनाव में PM तकाइची की बड़ी जीत:उनकी पार्टी LDP ने 465 में से 316 सीटें जीतीं; PM पीएम मोदी ने बधाई दी जापान में रविवार को हुए आम चुनाव में प्रधानमंत्री साने ताकाइची की लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी (LDP) ने बड़ी जीत दर्ज की है। BBC के मुताबिक, LDP के गठबंधन को 465 में से 352 सीटें मिली हैं। LDP अकेले 316 सीटें जीती हैं, जो बहुमत के लिए जरूरी 233 सीटों से काफी ज्यादा हैं। यह पार्टी की अब तक की सबसे बड़ी जीतों में से एक मानी जा रही है। इससे पहले 1986 में पार्टी ने 300 सीटें जीती थीं। चुनाव जीतने के बाद ताकाइची ने कहा कि वह जापान को मजबूत और समृद्ध बनाने पर काम करेंगी। उन्होंने यह भी कहा कि जरूरत पड़ी तो विपक्ष के साथ मिलकर काम करेंगी। इस जीत के बाद ऊपरी सदन में विपक्ष के नियंत्रण के बावजूद PM ताकाइची को कानून पास करने की ताकत मिल गई है। तकाइची की जीत पर पीएम मोदी ने उन्हें बधाई दी। उन्होंने X पोस्ट में लिखा- मुझे विश्वास है आपके कुशल नेतृत्व में हम भारत-जापान मित्रता को नई ऊंचाइयों पर ले जाएंगे। पढ़ें पूरी खबर… एपस्टीन फाइल्स- 10 देशों में इस्तीफे, 80 की जांच:अमेरिका से यूरोप तक असर; राजनेताओं, राजदूतों, अरबपतियों और शाही परिवारों तक फैली जांच अमेरिका में यौन अपराधी जेफ्री एपस्टीन से जुड़े सीक्रेट दस्तावेज सामने आते ही दुनिया भर में हड़कंप मच गया है। अमेरिकी जस्टिस डिपार्टमेंट ने करीब 30 लाख पेज के डॉक्यूमेंट्स 30 जनवरी को जारी किए हैं। इसके बाद 10 देशों में 15 से ज्यादा बड़े अधिकारियों को पद छोड़ना पड़ा है। 80 से ज्यादा ताकतवर लोगों पर जांच चल रही है। इन फाइलों में नेता, राजदूत, अरबपति और शाही परिवारों के नाम शामिल हैं। ईमेल, फ्लाइट लॉग और संपर्क रिकॉर्ड में 700 से 1000 असरदार लोगों का जिक्र है। कई मामलों में नाबालिग लड़कियों के यौन शोषण के आरोप भी हैं। दस्तावेजों में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प, पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन और हिलेरी क्लिंटन जैसे हाई-प्रोफाइल नाम अलग-अलग संदर्भों में सामने आए हैं। पढ़ें पूरी खबर…
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