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    ‘उद्योग’ की परिभाषा पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई:9 जजों की बेंच के सामने मामला; तय होगा सरकारी विभाग-NGO उद्योग माने जाएंगे या नहीं

    16 hours ago

    सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संविधान पीठ ने मंगलवार को औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 में ‘उद्योग’ शब्द की परिभाषा से जुड़े मामले पर सुनवाई शुरू की। कोर्ट तय करेगा कि सरकारी विभाग, अस्पताल, स्कूल और NGO जैसी संस्थाएं ‘उद्योग’ की कैटेगरी में आएंगी या नहीं और उन पर श्रम कानून लागू होंगे या नहीं। मंगलवार को मामले की सुनवाई शुरू हुई। सुनवाई के दौरान पक्षकारों ने 1978 के बैंगलोर वाटर सप्लाई एंड सीवरेज बोर्ड बनाम ए. राजप्पा फैसले में दी गई ‘उद्योग’ की परिभाषा पर शुरुआती दलीलें रखीं। बेंच ने इस बात पर विचार शुरू किया कि क्या उस फैसले में दी गई व्यापक परिभाषा सही है या उसके दायरे को सीमित करने की जरूरत है। मामले की सुनवाई आगे भी जारी रहेगी। 9 जजों की बेंच सुन रही मामला बेंच की अध्यक्षता CJI सूर्यकांत कर रहे है। बेंच में जस्टिस बीवी नागरत्ना, जस्टिस पीएस नरसिम्हा, जस्टिस दीपांकर दत्ता, जस्टिस उज्ज्वल भुइयां, जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा, जस्टिस जॉयमाल्या बागची, जस्टिस आलोक अराधे और जस्टिस विपुल एम पंचोली शामिल हैं। सुनवाई 18 मार्च को खत्म हो जाएगी। सुप्रीम कोर्ट ने 16 फरवरी को तय किया था कि ‘उद्योग’ की परिभाषा, सरकारी संस्थाओं की स्थिति, NGO और चैरिटी संस्थाओं की भूमिका तथा 1978 के पुराने फैसले की समीक्षा जैसे मुद्दों पर यह बड़ी बेंच सुनवाई करेगी। इस मामले के फैसले से यह तय होगा कि किन-किन संस्थाओं पर श्रम कानून लागू होंगे। इससे कर्मचारियों के अधिकार जैसे छंटनी, वेतन, यूनियन बनाने का अधिकार और सेवा शर्तों पर भी असर पड़ सकता है। उद्योग शब्द पर विवाद क्यों… 1978 में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस वीआर कृष्ण अय्यर ने 'बैंगलोर वाटर सप्लाई एंड सीवरेज बोर्ड' मामले (1978) में उद्योग की विस्तृत परिभाषा दी थी। फैसले के पैराग्राफ 140 से 144 में कहा गया था कि जहां नियोक्ता और कर्मचारी का संबंध है और कोई सेवा/काम होता है, वह उद्योग हो सकता है। इस परिभाषा की वजह से सरकारी विभाग, अस्पताल, स्कूल, NGO भी उद्योग माने जाने लगे और उन पर लेबर कानून लागू हो गए। मई 2005 में सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की बेंच ने औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा 2(j) में उद्योग शब्द की परिभाषा की व्याख्या से जुड़े इस मामले को एक बड़ी बेंच के पास भेज दिया था। बेंच ने कहा था कि बड़ी बेंच को सभी कानूनी सवालों के हर पहलू और गहराई पर विचार करना होगा। इसके बाद 2017 में तत्कालीन CJI टीएस ठाकुर की अध्यक्षता वाली 7 जजों की बेंच ने कहा था कि उसकी राय में, उसके सामने आई अपीलों को नौ जजों की बेंच के सामने रखा जाना चाहिए, क्योंकि इस मुद्दे के गंभीर और दूरगामी असर हो सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट इन मुद्दों पर देगा फैसला…
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