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    राजस्थानी लेफ्टिनेंट कर्नल ने हजारों की पाकिस्तानी फौज को हराया:हमले से पहले जवानों को दिखाई फिल्म, अजमेर-जोधपुर में ट्रेनिंग, कई शहर कब्जाए

    2 days ago

    जयपुर के पूर्व राजपरिवार के सदस्य और लेफ्टिनेंट कर्नल भवानी सिंह ने 1971 के युद्ध में पाकिस्तान को दो मोर्चों पर हराकर उसका भूगोल बदल दिया था। भवानी सिंह की 10 पैरा कमांडो टीम के दो ग्रुपों ने पाकिस्तान के अंदर 80 किलोमीटर जाकर छाछरो, नगरपारकर और विरावा पर कब्जा कर लिया था। पाकिस्तान में इस सर्जिकल स्ट्राइक की पूरी रणनीति भवानी सिंह ने ही तैयार की थी। पाकिस्तान पर हमले के लिए ऑपरेशन 'कैक्टस लिली' के नाम से भवानी सिंह ने लंबे समय से रणनीति बनाई थी। केवल 125 स्पेशल फोर्स के जवानों ने लेफ्टिनेंट कर्नल भवानी सिंह की अगुवाई में हजारों पाकिस्तानी सैनिकों को हराया और हमारे एक भी सैनिक की शहादत नहीं हुई। छाछरो (पाकिस्तान) में कब्जे के बाद वहां अलग से कलेक्टर तक लगाया। यह इलाका काफी समय तक भारत के कब्जे में रहा। शिमला ​समझौते के वक्त छाछरो का इलाका वापस पाकिस्तान को दिया गया था। जयपुर में 15 जनवरी को आर्मी डे परेड होगी। इस मौके पर खास सीरीज के तहत आज पढ़िए ब्रिगेडियर भवानी सिंह की छाछरो विजय की कहानी... सबसे पहले लेफ्टिनेंट कर्नल भवानी सिंह की 5 बड़ी रणनीतियां, जिनसे पाकिस्तान को हराया अब आगे पढ़ें पाकिस्तान में कब्जे की पूरी कहानी... 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के समय भवानी सिंह लेफ्टिनेंट कर्नल थे। युद्ध शुरू होने से काफी पहले भवानी सिंह ने राजस्थान की सीमा से सटे पाकिस्तान के कुछ इलाकों पर कब्जा करने की रणनीति बनानी शुरू कर दी थी। वे पाकिस्तान में सर्जिकल स्ट्राइक करके दुश्मन पर बढ़त बनाने की तैयारी में थे। छाछरो (पाकिस्तान) पर की गई सर्जिकल स्ट्राइक मिलिट्री इतिहास में अनोखा ऑपरेशन था, जिसमें भारतीय सेना ने एक भी जवान नहीं खोया। जासूसी के लिए अपने स्तर पर नेटवर्क बनाया पाकिस्तान में 80 किलोमीटर अंदर घुसकर रेड करने से पहले भवानी सिंह ने अपने स्तर पर लंबी तैयारी की थी। इसके लिए उन्होंने बॉर्डर इलाकों का कई बार गुपचुप दौरा किया। दिल्ली में वो आर्मी हेडक्वार्टर में यह कहकर जाते थे कि जोधपुर जा रहे हैं। उन्होंने अपने स्तर पर बाड़मेर और जैसलमेर से सटे पाकिस्तान के इलाकों में जासूसी करवाने का नेटवर्क बनाया। उन्होंने खुद का इन्फॉरमेशन नेटवर्क तैयार किया था। वे लगातार पाकिस्तान से होने वाले युद्ध से पहले उस जासूसी नेटवर्क से सूचनाएं लेते थे। मेजर जनरल दलबीर सिंह के हवाले से उनकी बायोग्राफी में लिखा गया है- भवानी सिंह आर्मी हेडक्वार्टर लगातार आते थे तो हमने इसे रूटीन समझा। बाद में पता लगा कि उन्होंने बहुत से रहस्य छुपा रखे थे। वे कुछ समय के लिए जोधपुर हेड क्वार्टर जाने की बात कह कर जाते थे, लेकिन वास्तव में वह बाड़मेर में अपने सूत्रों से मुलाकात करने के लिए जाते थे। वे जैसलमेर जाकर भी अपने सूत्रों से इंटेलिजेंस से जुड़ी सूचना एकत्रित करते थे। उन्होंने बॉर्डर पर अपना एक पैरेलल नेटवर्क तैयार किया था जो पाकिस्तान की गुप्त सूचनाएं देते थे। उन्होंने इस ऑपरेशन के बारे में किसी को कुछ नहीं बताया था। उन्होंने मिलिट्री इंटेलिजेंस के फंड का बहुत बेहतरीन उपयोग किया था। लगातार अपडेट लेते थे भवानी सिंह भवानी सिंह के संपर्क में लक्ष्मण सिंह सोढ़ा और बलवंत सिंह सोढ़ा थे। ये बॉर्डर एरिया के रहने वाले थे। इनके दोनों तरफ अच्छे संपर्क थे। भवानी सिंह ने उन दोनों से पाकिस्तान से सूचनाएं हासिल करने में मदद ली। उनसे पाकिस्तान के कम्युनिकेशन नेटवर्क, वहां के फौजी मूवमेंट, दुश्मन की ताकत, वहां का रोड नेटवर्क और जनता के बीच के पॉपुलर सेंटिमेंट के बारे में जानकारियां लिया करते थे। रेगिस्तान के हिसाब से खास जीपें डिजाइन करवाईं पाकिस्तान के छाछरों पर धावा बोलने के लिए भवानी सिंह ने हर व्हीकल को रेगिस्तान की जरूरत के हिसाब से मोडिफाइड करवाया था। आमतौर पर आर्मी की जीपों में 40 लीटर का ही फ्यूल टैंक हुआ करता था। भवानी सिंह ने उनमें चार से पांच दिन चलने लायक सारा सामान और फ्यूल आ सके इस तरह से उन्हें मोडिफाइड करवाया था। आर्मी की जीप 5 किलोमीटर प्रति लीटर का एवरेज देती थी। हर जवान के पास 5 दिन का खाना और सर्वाइवल किट दिया गया था। स्पेशल फोर्स में शामिल हर जवान के पास हैदराबाद की लैब से तैयार किया हुआ स्पेशल फूड किट दिया गया था। इस फूड किट से 5 दिन आराम से काम चल सकता था। इसके अलावा चना, शकरपारा जैसे देसी राजस्थानी फूड भी उनकाे साथ में दिए गए थे। जवानों की नसीराबाद और जोधपुर में स्पेशल ट्रेनिंग हुई पाकिस्तान के इलाकों पर कब्जा करने वाली स्पेशल टीम की नसीराबाद और जोधपुर में ट्रेनिंग हुई थी। 3 दिसंबर 1971 को पाकिस्तान के एयरफोर्स ने जोधपुर एयर फील्ड पर बमबारी की। इसके बाद युद्ध घोषित हो चुका था। सेना की 12th डिवीजन को लोंगेवाला (जैसलमेर) की तरफ भेजा गया था, जहां पर पाकिस्तान ने घुसपैठ की थी। इस दौरान ऑपरेशन वाले पैरा कमांडो आगरा में आदेशों का इंतजार कर रहे थे। बॉर्डर कूच करने से पहले फिल्म दिखाई थी छाछरो पर कब्जा करने के पूरे अभियान का नाम ऑपरेशन 'कैक्टस लिली' रखा था। इसकी पूरी तैयारी लंबे समय से चल रही थी। पाकिस्तानी हमले का इनपुट पहले से था, इसलिए सब तैयारी थी। 3 दिसंबर 1971 को जोधपुर एयरपोर्ट पर पाकिस्तानी बमबारी के बाद भवानी सिंह ने ऑपरेशन कैक्टस लिली की शुरुआत की। इस अभियान में शामिल स्पेशल फोर्स की दो टीमों को चार्ली और अल्फा कंपनी नाम दिया गया। 4 दिसंबर 1971 की रात को चार्ली और अल्फा कंपनियों को बॉर्डर की तरफ कूच करना था। इससे पहले उन्होंने मॉर्निंग शो के दौरान जोधपुर में अल्फा और चार्ली कंपनियों को एक वॉर फिल्म देखने के लिए भेजा। इसी दिन शाम को 6 बजे बाद सूरज छिपते ही दोनों कंपनियों को बॉर्डर की तरफ भेजा गया। उन्हें 5 दिसंबर को पाकिस्तान में घुसने से पहले बॉर्डर पर इकट्ठे होने का टास्क दिया गया था। सेना के काफिले के आगे बॉर्डर के स्थानीय जानकारों को भेजा भवानी सिंह ने बॉर्डर पर स्थानीय जानकार लक्ष्मण सिंह सोढ़ा और उनके साथी जासूसों को थ्री नॉट थ्री बंदूकें देकर ट्रेंड किया था। छाछरो कूच के दौरान आर्मी की टीम के आगे लक्ष्मण सिंह सोढ़ा के नेटवर्क में शामिल लोग काफिले को एस्कॉर्ट करते हुए चल रहे थे। यह सब एक रणनीति के तहत किया गया। पाकिस्तानी फौज के दो ट्रक दिखे भवानी सिंह की बटालियन पहले से डिसाइड रूट से होते हुए छाछरो (पाकिस्तान) से 15 किलोमीटर पहले तक पहुंच गई थी। वहां पर उनको पाकिस्तानी रेंजर्स के स्टेशन और कम्युनिकेशन सेंटर को तबाह करना था। भवानी सिंह की स्पेशल फोर्स का काफिला चल रहा था। इसी दौरान उन्होंने पाकिस्तानी सेना के दो ट्रक देखे। ये ट्रक उनसे आगे चल रहे थे, लेकिन उनकी ट्रूप्स ने उनकी तरफ ध्यान नहीं दिया। इस घटना को याद करते हुए टीम में शामिल सूबेदार पन्ने सिंह राठौड़ ने अपने संस्मरण में कहा है- पाकिस्तानी यह कल्पना भी नहीं कर सकते थे कि भारतीय फौजें इतनी अंदर तक आ सकती हैं। इसलिए हमने किसी भी तरह की कोई प्रतिक्रिया नहीं की और आराम से चलते रहे। हमारे लिए एक अच्छी बात यह भी थी कि दोनों तरफ के लोग समान थे। हमारी यूनिफॉर्म भी पाकिस्तानी फौज जैसी ही थी, इसलिए किसी ने ध्यान नहीं दिया। चार्ली कंपनी को पाकिस्तानी रेंजर्स और कम्युनिकेशन हब छाछरो और अमरकोट को टारगेट करने का टास्क दिया था। 5 दिसंबर की रात को टीम किता पहुंच चुकी थी। यह छाछरो से मात्र 15 किलोमीटर दूर थी। 6 दिसंबर को टीम फिर आगे बढ़ी। यहां उन्होंने गैरजरूरी सामान को ऑफ लोड कर दिया। गार्ड के तौर पर दो कमांडो को छोड़ दिया। 7 दिसंबर 1971 की तड़के 3 से 4 बजे के बीच भवानी सिंह की केवल 125 जवानों की स्पेशल फोर्स (चार्ली कंपनी) ने छाछरो पर कब्जा कर लिया। यहां पर पाकिस्तानी रेंजर्स की पूरी एक कंपनी थी। इसमें 800 से 1000 रेंजर थे। छाछरो में यह अफवाह फैल गई थी कि भारी तादाद में भारतीय फौज ने अटैक किया है। पूरा इलाका कब्जा लिया है। ​केवल 125 भारतीय जवानों की टीम ने पाकिस्तानी रेंजर्स की 1000 जवानों की कंपनी को ग्राउंड फाइट में भागने पर मजबूर कर दिया। पाकिस्तानी रेंजर्स की पूरी कंपनी भाग खड़ी हुई। 17 जिंदा पकड़े गए थे और 13 मारे गए थे। रात में हुए हमले में पाकिस्तानी रक्षा पंक्ति को समझने का वक्त ही नहीं मिला था। छाछरो के बैंक का पैसा और सोना जब्त किया छाछरो पर कब्जे के बाद वहां एक सरकारी इमारत में क्लीन आउट ऑपरेशन चलाया गया। छाछरो के बैंक में जमा पैसा और सोना था। इसे जब्त करके सूबेदार मेजर को सौंपी गई। बैंक में उस वक्त 60 हजार रुपए मिले। इसे भारत सरकार को सौंपने के लिए सूबेदार मेजर को जिम्मेदारी दी गई। छाछरो में सैनिकों ने पानी की टंकी उड़ाने का सुझाव दिया, लेकिन भवानी सिंह ने इसे खारिज कर दिया। उनका तर्क था कि यह इलाका लंबे समय तक हमारे पास रहेगा और यह टंकी आगे सैनिकों के काम आएगी। पाकिस्तानी एयर फोर्स को नहीं दिखे कमांडो छाछरो पर कब्जे के बाद पाकिस्तानी एयर फोर्स ने दो फाइटर एयरक्राफ्ट भेजे, लेकिन ऊपर से कुछ भी नहीं दिखा। दोनों लौट गए। 10 पैरा के कमांडोज की स्पेशल ड्रेस पाकिस्तानी सेना से मिलती-जुलती होने के कारण उन्हें आसानी हुई। फाइटर प्लेन ऊपर से ऐसा वह कुछ भी नहीं देख पाए। टीम के पास आगे वीराबा और नगरपारकर पर कब्जा करने का टास्क था। नगरपारकर तहसील हेड क्वार्टर और वहां पर पाकिस्तानी रेंजर्स की पोस्ट को खत्म करना था। भवानी सिंह ने तय किया कि जीपों के साइलेंसर निकालकर काफिले को आगे बढ़ाया जाए, ताकि ऐसा लगे की पूरी टैंक का एक स्क्वॉयड मूव कर रहा है। पैरा टीम जीपों के साइलेंसर निकालकर आगे बढ़ी। इससे वहां पर ऐसा लगा, जैसे भारतीय सेना की टैंक स्क्वॉयड आगे बढ़ रही हो। पूरी टीम ने बिना किसी विरोध के नगरपारकर तहसील हेड क्वार्टर और पाकिस्तान रेंजर्स की कम्युनिकेशन पोस्ट पर कब्जा कर लिया। कम्युनिकेशन फैसिलिटी को बर्बाद करने के बाद एक टीम बॉर्डर से सटे बाखासर की बीएसएफ आउट पोस्ट की तरफ कूच कर गई, ताकि वापस भारतीय क्षेत्र में एंटर कर सके। वापसी के वक्त बीएसएफ ने कर दी थी फायरिंग छाछरो और नगरपारकर पर कब्जा कर लौटी स्पेशल फोर्स, बॉर्डर पर बीएसएफ पोस्ट पहचान नहीं पाई और गोलीबारी शुरू कर दी। बीएसएफ को इस बारे में सूचना नहीं थी। इसलिए उन्होंने पाकिस्तानी फौज का हमला समझकर फायरिंग शुरू कर दी। बीएसएफ का वायरलेस नेटवर्क खराब होने की वजह से भवानी सिंह बीएसएफ को यह नहीं बता पाए कि हमारी फोर्स वापस आ रही है। बीएसएफ की फायरिंग के बाद सफेद रूमाल निकाल कर उससे संकेत दिया गया। उसके बाद गोलाबारी बंद हुई। इसके बाद टीम ने वापस बॉर्डर पार किया। छाछरो ऑपरेशन के लिए महावीर चक्र, वीर चक्र और सेना मेडल छाछरो ऑपरेशन के लिए 10 पैरा टीम को 26 जनवरी 1972 को सम्मानित किया गया था। लेफ्टिनेंट कर्नल भवानी सिंह को महावीर चक्र, मेजर एसडी शर्मा और हवलदार नायक निहाल सिंह को वीर चक्र, कैप्टन पीएल बावा, सूबेदार सोहन सिंह और सुल्तान खान को सेना मेडल से सम्मानित किया गया था। सेना में अफसर रहते हुए एक रुपया महीना सैलरी लेते थे भवानी सिंह राजपरिवार से होने के बावजूद भवानी सिंह ने सेना के सीनियर्स हों या जूनियर किसी को इसका अहसान नहीं होने देते थे। अपने जूनियर्स का हमेशा ध्यान रखते थे। जवानों के बीच रहना और उनसे लगातार संपर्क में रहना उनकी आदत थी। जब सेना में उन्हें कमीशन मिला तो उन्होंने सैलरी लेने से इनकार कर दिया था। सेना में बिना सैलरी काम करने का प्रावधान नहीं था। इसलिए उन्होंने सैलरी के तौर पर एक रुपया लेने का फैसला किया। पूरी सर्विस वे यह टोकन सैलरी ही लेते रहे। राष्ट्रपति के बॉडीगार्ड रहे भवानी सिंह भवानी सिंह 1955 से 1963 तक राष्ट्रपति के बॉडीगार्ड रहे। राष्ट्रपति के बॉडी गार्ड के तौर पर तमाम सुरक्षा प्रोटोकॉल को फॉलो करना उनकी जिम्मेदारी थी। इस दौरान उन्होंने कई तरह के सिक्योरिटी से जुड़े मानक भी नए सिरे से बनाए। घातक प्रहार करने वाली नई बटालियन बनाई 1962 में चीन से हुई हार के बाद भारतीय सेना में एक ऐसी स्पेशल फोर्स का गठन करने का आइडिया दिया गया जो सरप्राइज अटैक कर सके। उस समय इस बटालियन को 9 पैरा के नाम से जाना जाता था। भवानी सिंह इस बटालियन में थे। इसमें सेना से सबसे बेहतरीन कमांडो को लिया गया था। इस यूनिट का आइडिया देने वाले और उसको ट्रेंड करने वाले लेफ्टिनेंट कर्नल मैक्सवेल थे। भवानी सिंह सेकेंड इन कमान थे। बाद में 9 और 10 पैरा को अलग-अलग जगह की जिम्मेदारी दी गई और यह एक स्पेशल फोर्स बनाई गई। भवानी सिंह ने ट्रेनिंग, ड्रेस से लेकर सारा प्रोटोकॉल अलग से बनवाया। इसके पीछे मकसद था कि नई बटालियन अपनी विशिष्ट पहचान रखे। पश्चिमी देशों की स्पेशल फोर्सेज की तर्ज पर सम्मान प्राप्त करे। 10 पैरा स्पेशल फोर्स के लिए राजस्थान के डेजर्ट रंग में मिलती हुई ड्रेस डिजाइन की गई। डेजर्ट स्कॉर्पियो का चिन्ह इन हाउस स्टेशनरी में प्रयोग किया गया। इस स्पेशल फोर्स को इस तरह डिजाइन किया कि वह हर जगह घातक प्रहार कर सके। 1972 में आर्मी से वॉलंटियर रिटायरमेंट लिया युद्ध खत्म होने के बाद 1972 में भवानी सिंह को आर्मी हैडक्वार्टर में पोस्टिंग दे दी गई। आम तौर पर युद्ध में बेहतरीन प्रदर्शन करने वाले आर्मी अफसरों को इस तरह की पोस्टिंग नहीं दी जाती, लेकिन उनके साथ ऐसा हुआ। कुछ समय बाद उन्होंने स्वैच्छिक रिटायरमेंट ले लिया। भवानी सिंह ने आर्मी से जल्दी रिटायरमेंट भले ले लिया, लेकिन वे आर्मी के साथियों से लगातार जुड़े रहे। अक्सर वे उनसे मिलने जाते रहते थे। रिटायरमेंट के बाद श्रीलंका में भारतीय शांति सेना में शामिल हुए श्रीलंका में एलटीटीई के विद्रोहियों से निपटने के लिए भारत ने शांति सेना भेजी थी। भारतीय शांति सेना में 10 पैरा रेजिमेंट थी। भवानी सिंह के पुराने साथी शांति सेना में थे, वे उनसे संपर्क में थे। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने उनसे शांति सेना को सलाह देने और हालात पर ​लगातार रिपोर्ट देने के लिए श्रीलंका जाने का आग्रह किया। भवानी सिंह ने श्रीलंका जाकर शांति सेना को गाइड किया। जवानों से मिले और ऑपरेशन से जुड़े टिप्स भी दिए। वे फौजियों के साथ ही रहे। शांति सेना में दिए अहम योगदान के कारण उन्हें बिग्रेडियर पद पर प्रमोशन दिया गया था। (कंटेंट रेफरेंस : बबल्स : ए बायोग्राफी ऑफ ब्रिगेडियर एचएच महाराजा भवानी सिंह एमवीसी) (फोटो साभार : सदर्न कमांड इंडियन आर्मी)
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