Search

    Language Settings
    Select Website Language

    GDPR Compliance

    We use cookies to ensure you get the best experience on our website. By continuing to use our site, you accept our use of cookies, Privacy Policy, and Terms of Service.

    फिल्म रिव्यू –द राजा साब:हॉरर-कॉमेडी के नाम पर फैंटेसी का बिखरा प्रयोग, जहां स्केल तो है, लेकिन सिनेमा की आत्मा गायब है

    1 week ago

    फिल्म द राजा साब देखकर सबसे पहला सवाल यही उठता है कि क्या भव्यता ही अब सिनेमा की पहचान बन गई है। प्रभास जैसे सुपरस्टार, भारी बजट, हॉरर कॉमेडी का नया पैक और पैन इंडिया अपील, सब कुछ मौजूद है, लेकिन फिल्म खत्म होने तक यह साफ हो जाता है कि बड़े सेट, महंगे VFX और लंबी अवधि किसी फिल्म को अपने आप मजबूत नहीं बना देते। डायरेक्टर मारुति की यह फिल्म न डराती है, न हंसाती है और न ही भावनात्मक रूप से बांध पाती है। फिल्म की कहानी कहानी राजा प्रभास और उनकी दादी गंगम्मा (जरीना वहाब) से शुरू होती है। अल्जाइमर से जूझ रहीं गंगम्मा अपने लापता पति कनकराजू (संजय दत्त) को नहीं भूल पातीं। दादी की इसी उम्मीद के सहारे राजा अपने दादा की तलाश में निकल पड़ता है। यह तलाश उसे हैदराबाद से होते हुए एक रहस्यमयी और कथित तौर पर भूतिया महल तक ले जाती है, जहां तंत्र मंत्र, हिप्नोटिज्म, लालच और अतीत के कई राज छिपे हैं।कहानी सुनने में दिलचस्प लगती है, लेकिन पर्दे पर आते आते यह बिखर जाती है। फिल्म बिना ठोस वजह के लोकेशन बदलती है, किरदार आते जाते रहते हैं और दर्शक यह समझता रह जाता है कि असली दिशा आखिर है क्या? फिल्म में एक्टिंग प्रभास इस बार हल्के और कॉमिक अंदाज में दिखना चाहते हैं। कुछ सीन्स में उनकी टाइमिंग काम करती है, लेकिन किरदार की गहराई इतनी कम है कि उनसे जुड़ना मुश्किल हो जाता है। कई सीन में उनका लुक और एक्सप्रेशन अस्वाभाविक लगता है, मानो वे खुद भी पूरी तरह यकीन में न हों। जरीना वहाब फिल्म की सबसे ईमानदार परफॉर्मेंस देती हैं। उनके इमोशनल सीन असर छोड़ते हैं, खासकर क्लाइमैक्स के आसपास। संजय दत्त का किरदार दमदार हो सकता था, लेकिन लेखन उन्हें भी सीमित कर देता है। तीनों अभिनेत्रियां मालविका मोहनन, निधि अग्रवाल और रिद्धि कुमार कहानी का हिस्सा कम और सजावट ज्यादा बनकर रह जाती हैं। उनके पास करने के लिए लगभग कुछ भी यादगार नहीं है। कॉमिक कलाकारों की टीम कुछ जगह राहत देती है, लेकिन कमजोर स्क्रिप्ट उनकी भी ताकत छीन लेती है। फिल्म में निर्देशन और टेक्निकल पहलू मारुति की सबसे बड़ी चूक यही है कि फिल्म को क्या बनाना है, इस पर स्पष्टता नजर नहीं आती। हॉरर, कॉमेडी, फैंटेसी और इमोशन सब एक साथ परोसे गए हैं, लेकिन संतुलन कहीं नहीं है।एडिटिंग फिल्म को और भारी बना देती है। करीब तीन घंटे की लंबाई थकाने लगती है। सिनेमैटोग्राफी औसत है और जरूरत से ज्यादा ग्रीन स्क्रीन इस्तेमाल फिल्म को नकली बना देता है। VFX इतने बड़े बजट के बावजूद कई जगह कमजोर और अधूरे लगते हैं। फिल्म में म्यूजिक और बैकग्राउंड स्कोर थमन का म्यूजिक इस फिल्म की जान नहीं बन पाता। बैकग्राउंड स्कोर कई जगह जरूरत से ज्यादा तेज है, लेकिन असरदार नहीं। गाने कहानी की रफ्तार तोड़ते हैं और याद रहने लायक कोई धुन नहीं छोड़ते। फिल्म को लेकर फाइनल वर्डिक्ट द राजा साब एक ऐसी फिल्म है जो कागज पर बेहतर लगती है, पर्दे पर नहीं। इसमें पैसा है, स्टार है, स्केल है, लेकिन आत्मा नहीं।प्रभास की कोशिश नजर आती है, कुछ सीन ठीक हैं, लेकिन कुल मिलाकर फिल्म लंबी, थकी हुई और दिशाहीन लगती है। 400 करोड़ रुपए की इस भव्य यात्रा के बाद हाथ में बस यही सवाल बचता है कि अगर कहानी मजबूत नहीं थी, तो इतना बड़ा महल बनाने की जरूरत क्या थी।
    Click here to Read More
    Previous Article
    Priyadarshan lauds Aditya for Dhurandhar: 'Nothing greater...'
    Next Article
    ‘I’m Not Afraid’: 'Bloodied' Elderly Woman’s Defiance Goes Viral In Iran Protests: WATCH

    Related मनोरंजन Updates:

    Are you sure? You want to delete this comment..! Remove Cancel

    Comments (0)

      Leave a comment