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    एशिया की सबसे बड़ी यात्रा 'नंदा राजजात' पर कॉन्ट्रोवर्सी:लोगों का दावा- ये नहीं है असली नाम, पद्मश्री बोलीं- शासन के पास नहीं पहुंची सही जानकारी

    6 days ago

    उत्तराखंड में हर 12 साल में होने वाली एशिया की सबसे बड़ी पैदल धार्मिक यात्रा नंदादेवी राज-जात के शुरू होने से पहले ही इस पर विवाद खड़ा हो गया है। 2026 में प्रस्तावित यात्रा को लेकर यात्रा के स्टार्टिंग प्वॉइंट पर मतभेद सामने आए हैं। चमोली में नंदा-धाम क्षेत्र के कुरुड़ और आसपास के गांवों के लोगों ने आरोप लगाया है कि यात्रा की पौराणिक परंपरा से छेड़छाड़ की जा रही है और ऐतिहासिक रूप से जहां से ‘बड़ी यात्रा’ शुरू होती थी, उसे मौजूदा रूट मैप और कैलेंडर से बाहर कर दिया गया है। उनका कहना है कि यात्रा देवी की है, लेकिन आज इसे पूरी तरह राजा और नौटी गांव से जोड़कर प्रस्तुत किया जा रहा है। वहीं, वर्तमान आयोजन कर रही नौटी गांव की नंदादेवी राज-जात समिति का कहना है कि यात्रा राजा द्वारा स्थापित परंपरा के अनुसार ही संचालित हो रही है और इसमें किसी तरह का बदलाव नहीं किया गया है। अब पढ़िए क्या है विवाद और दोनों पक्षों के तर्क ... रूट मैप से हुआ विवाद, नंदा-धाम की मांग- कुरुड़ से शुरू हो यात्रा उत्तराखंड के चमोली में होने वाली इस भव्य यात्रा का आयोजन सरकार की मदद से श्री नंदा देवी राजजात समिति करवाती है, उन्होंने इस साल की यात्रा के लिए एक रूट मैप जारी किया है। इसी रूट मैप को लेकर नंदा-धाम क्षेत्र के लोगों ने आपत्ति जताई है। जारी कार्यक्रम के अनुसार यात्रा का पहला पड़ाव नौटी से ईड़ाबधाणी रखा गया है और कुल 20 पड़ावों के साथ करीब 280 किमी की यात्रा नौटी से शुरू होकर नौटी में ही समाप्त दिखाई गई है। नंदा-धाम के लोगों का कहना है कि इस रूट मैप में कुरुड़ का नाम कहीं शामिल नहीं है, जबकि पौराणिक मान्यताओं और पुराने दस्तावेजों के अनुसार यात्रा की मुख्य डोली और ‘बड़ी यात्रा’ की धार्मिक शुरुआत कुरुड़ स्थित नंदा देवी सिद्धपीठ से मानी जाती रही है। उन्होंने बीते दिन मुख्य सचिव से मिल मांग रखी है कि इसमें कुरुड को स्टार्टिंग प्वाइंट माना जाए और रूट में एड किया जाए। ‘कुरुड़ ही नंदा देवी का सिद्धपीठ, वही माता का मायका’ – भगवती नंदा-धाम क्षेत्र के निवासी भगवती का कहना है कि कुरुड़ में स्थित मंदिर ही नंदा देवी का एकमात्र सिद्धपीठ है, जिसकी स्थापना 750 ईस्वी में मानी जाती है। उनके अनुसार, माता नंदा का मायका नौटी नहीं बल्कि कुरुड़ है। भगवती के मुताबिक, जब गढ़वाल के राजा पर दोष लगा और उनके परिवार में अनहोनी हुई, तब उन्होंने नंदा माता को याद किया और माना कि वे यात्रा में शामिल होंगे। इसके बाद हर वर्ष कांसुवा और नौटी से लोग कुरुड़ आते थे और कुरुड़ के गौड़ ब्राह्मणों से चर्चा कर ही यात्रा की तिथि तय होती थी। बाद में राजा ने इस यात्रा को अपने नाम से जोड़ दिया और बड़ी यात्रा को नंदादेवी राज-जात कहा जाने लगा। उनका कहना है कि आज जारी रूट मैप में कुरुड़ का नाम तक नहीं है, जबकि नौटी में केवल राजा के ब्राह्मण रहते थे, जिन्हें कांसुवा के राजा ने बसाया था। मानदेय मिलने के बाद नौटी का दबाव बढ़ा– कर्नल हरेंद्र सिंह रावत नंदा-धाम के रिटायर्ड कर्नल हरेंद्र सिंह रावत का कहना है कि 2000 में उत्तर प्रदेश सरकार के समय यात्रा में मानदेय देना शुरू किया गया, जिसके बाद नौटी गांव के लोगों का प्रभाव यात्रा में बढ़ता चला गया। उनके अनुसार, आज भी यात्रा में करोड़ों रुपए का सरकारी बजट लगाया जाता है। कर्नल रावत कहते हैं कि नंदा-धाम के लोग चाहते हैं कि सरकार यात्रा में बजट न दे और आयोजन से जुड़े लोग स्वयं ही खर्च वहन करें, ताकि परंपरा पर किसी तरह का प्रभाव न पड़े। पद्मश्री बसंती बिष्ट बोलीं- द्वापर युग से चली आ रही यात्रा नंदा-धाम के लोगों के साथ मौजूद पद्मश्री से सम्मानित लोक गायिका बसंती बिष्ट ने कहा कि यह यात्रा द्वापर युग से चली आ रही है और उन्होंने अपनी किताब में भी इसका उल्लेख किया है। उनका कहना है कि शासन तक सही जानकारी नहीं पहुंच पा रही है। बसंती बिष्ट के अनुसार, पहले कुरुड़ के स्थानीय लोगों के माध्यम से यात्रा का आयोजन होता था। राजा के प्रतिनिधि नौटी से कुरुड़ जाते थे, जहां पुजारी यात्रा का दिन तय करते थे। कुरुड़ के गौड़ ब्राह्मण आपस में बैठक कर आयोजन कराते थे और खर्च उठाते थे। इसके बाद नंदकेसरी में राजा और यात्रा का मिलन होता था, जहां राजा अपनी मनौती मांगता था और फिर उसकी अगुआई में यात्रा आगे बढ़ती थी। ‘अब राजा ही सब कुछ मान लिया गया’ नंदा-धाम के प्रकाश चंद्र गौड़ का कहना है कि वे चाहते हैं कि लोक परंपरा को न तोड़ा जाए और पौराणिक मान्यताओं के अनुसार यात्रा को दुनिया के सामने प्रस्तुत किया जाए। उनका आरोप है कि नौटी गांव के लोग परंपरा को तोड़ने का काम कर रहे हैं। प्रकाश चंद्र गौड़ के मुताबिक, नौटी पक्ष यह मानने लगा है कि देवी को राजा के पास आना चाहिए, जबकि परंपरा के अनुसार राजा स्वयं देवी के पास जाते थे। आयोजन समिति का जवाब- परंपरा से कोई छेड़छाड़ नहीं नंदा-धाम के लोगों ने बताया कि सचिव के साथ हुई बैठक में नौटी गांव की आयोजन समिति के सदस्यों को भी आना था, लेकिन वे नहीं पहुंचे। इस पर भास्कर एप ने आयोजन समिति के महामंत्री भुवन नौटियाल से फोन पर बात की। भुवन नौटियाल ने कहा कि यात्रा के साथ जरा भी छेड़छाड़ नहीं हो रही है। उन्होंने कहा कि यात्रा पौराणिक मान्यताओं के अनुसार ही चल रही है और राजा ने जो परंपरा शुरू की थी, वही आज तक निभाई जा रही है। सचिव बोले–सभी की भावनाओं का सम्मान, बैठक में समाधान इस पूरी कॉन्ट्रोवर्सी पर पर्यटन सचिव धीरज सिंह गर्ब्याल ने कहा कि यात्रा में पड़ने वाले सभी गांवों के प्रतिनिधियों से वार्ता की गई है। उनकी आवश्यकताओं के अनुसार सभी इन्फ्रास्ट्रक्चर विकसित किए जाएंगे, ताकि किसी को कोई समस्या न हो। उन्होंने कहा कि स्थानीय लोगों की सभी समस्याओं का उच्च स्तरीय बैठक में समाधान कराया जाएगा। उनकी मांगों पर अलग से चर्चा होगी। यात्रा भावना के अनुसार ही चलेगी और सरकार सभी की भावनाओं का सम्मान करती है। अब नंदा देवी राज जात के बारे में जानिए... यह उत्तराखंड की प्रसिद्ध धार्मिक यात्रा है, जिसमें देवी नंदा को उनके ससुराल कैलाश भेजने के लिए लंबी पैदल यात्रा की जाती है। यात्रा करीब 280 किमी की होती है। इसमें चौसिंगा खाडू और रिंगाल की छंतोलियां मुख्य आकर्षण होती हैं। यह देवी के मायके से कैलाश लौटने का प्रतीक मानी जाती है। यात्रा में रूपकुंड और शैल समुद्र ग्लेशियर के पास से होते हुए होमकुंड तक जाया जाता है। वाण गांव के बाद चमड़े की वस्तुएं, गाजे-बाजे, महिलाएं और बच्चे आगे नहीं जाते। यह एशिया की सबसे लंबी पैदल धार्मिक यात्राओं में से एक मानी जाती है, जिसमें सैकड़ों देवी-देवताओं की डोलियां और हजारों श्रद्धालु शामिल होते हैं।
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