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    ब्रिटेन का अमेरिका को अपने एयरबेस देने से इनकार:ईरान पर हमले के लिए इनकी जरूरत; चागोस आइलैंड्स को लेकर US-UK में तनातनी

    9 hours ago

    ब्रिटेन ने अमेरिका को ईरान पर हमले के लिए अपने एयरबेस देने से इनकार कर दिया है। अमेरिका इन ठिकानों का इस्तेमाल करना चाहता था, लेकिन ब्रिटेन ने साफ मना कर दिया। इसी मुद्दे पर अमेरिका और ब्रिटेन के बीच तनाव बढ़ता दिख रहा है। डेली मेल के मुताबिक, इस फैसले से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प नाराज हैं। कहा जा रहा है कि उन्होंने ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर के उस समझौते से समर्थन वापस ले लिया है, जिसमें चागोस आइलैंड्स को मॉरीशस को सौंपने की बात थी। अमेरिका, ईरान पर संभावित हमले की तैयारी कर रहा है और इसके लिए वह डिएगो गार्सिया और ब्रिटेन के RAF फेयरफोर्ड बेस का इस्तेमाल करना चाहता है। डिएगो गार्सिया, जो चागोस आइलैंड्स का सबसे बड़ा द्वीप है, 1970 के दशक से ब्रिटेन और अमेरिका का कॉमन मिलिट्री बेस रहा है। हालांकि पुराने समझौतों के मुताबिक, ब्रिटेन के किसी भी सैन्य ठिकाने का इस्तेमाल तभी किया जा सकता है, जब ब्रिटिश प्रधानमंत्री की मंजूरी हो। अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार, अगर किसी देश को पता है कि कोई सैन्य कार्रवाई गलत है और फिर भी वह मदद करता है, तो उसे भी जिम्मेदार माना जा सकता है। ट्रम्प बोले- चागोस आइलैंड्स छोड़ना बहुत बड़ी गलती ट्रम्प ने चागोस आइलैंड्स को लेकर ब्रिटेन की जमकर आलोचना की है। उन्होंने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर लिखा कि 100 साल की लीज किसी देश के मामले में ठीक फैसला नहीं है। डिएगो गार्सिया जैसा ठिकाना छोड़ना बहुत बड़ी गलती होगी। ट्रम्प ने कहा कि अगर ईरान अमेरिका के साथ समझौता नहीं करता, तो अमेरिका को हिंद महासागर में मौजूद डिएगो गार्सिया और फेयरफोर्ड के एयरफील्ड का इस्तेमाल करना पड़ सकता है। ऐसे में इन ठिकानों का कंट्रोल बेहद जरूरी है। वहीं ब्रिटिश सरकार का कहना है कि मॉरीशस के साथ समझौता सुरक्षा कारणों से जरूरी है। उनका तर्क है कि इससे लंबे और महंगे कानूनी विवाद से बचा जा सकेगा। बताया जा रहा है कि इस पूरे समझौते पर करीब 35 अरब पाउंड तक खर्च आ सकता है। डिएगो गार्सिया, हिंद महासागर में स्थित चागोस आइलैंड्स का हिस्सा है। ब्रिटेन ने 1814 में नेपोलियन को हराने के बाद इन आइलैंड्स पर कब्जा किया था। 1965 में इन्हें मॉरीशस से अलग कर ‘ब्रिटिश हिंद महासागर क्षेत्र’ बना दिया गया। 1968 में जब मॉरीशस को आजादी मिली, तब यह तय हुआ था कि जब इन द्वीपों की रक्षा के लिए जरूरत नहीं रहेगी, तो इन्हें मॉरीशस को लौटा दिया जाएगा। बाद में डिएगो गार्सिया पर अमेरिका और ब्रिटेन ने मिलकर एक जॉइंट मिलिट्री बेस बनाया था। मॉरीशस 50 साल से इन आइलैंड्स का अधिकार मांग रहा मॉरीशस 1980 के दशक से इन आइलैंड्स पर अपना अधिकार मांगता रहा है और उसने यह मामला अंतरराष्ट्रीय अदालतों में उठाया। साल 2019 में अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने एक फैसले में कहा कि 1968 में मॉरीशस को आजादी देते वक्त उपनिवेश खत्म करने की प्रोसेस पूरी नहीं हुई थी और ब्रिटेन को जल्द से जल्द चागोस आइलैंड्स का प्रशासन खत्म करना चाहिए। ऋषि सुनक के लीडरशिप वाली कंजरवेटिव सरकार ने 2022 में ऐलान किया कि ब्रिटेन और मॉरीशस चागोस आइलैंड्स की संप्रभुता को लेकर बातचीत शुरू करेंगे। सरकार ने कहा कि सुरक्षा और कानूनी विवादों से बचने के लिए स्थिति साफ करना जरूरी था, ताकि डिएगो गार्सिया में ब्रिटेन-अमेरिका का मिलिट्री बेस बिना रुकावट चलता रहे। इसी कारण जुलाई 2024 के चुनाव से पहले मॉरीशस से 11 दौर की बातचीत हुई। ब्रिटेन-अमेरिकी की सालों पुरानी दोस्ती में खटास ब्रिटेन और अमेरिका की दोस्ती बहुत पुरानी है। दूसरे विश्व युद्ध से लेकर NATO तक, इराक-अफगानिस्तान युद्ध से लेकर खुफिया नेटवर्क 'फाइव आइज' तक, दोनों देश ज्यादातर मामलों में एक ही लाइन पर चलते रहे हैं। लेकिन पिछले कुछ वक्त में हालात बदल गए हैं, दोनों देशों में कई मुद्दों पर विरोध नजर आ रहा है। अमेरिका और ब्रिटेन में दूरी की चार वजहें... 1. अंतरराष्ट्रीय हालात को लेकर दोनों की अलग सोच सबसे पहला फर्क सैन्य कार्रवाई और अंतरराष्ट्रीय कानून को लेकर है। ईरान पर संभावित अमेरिकी हमले को लेकर लंदन थोड़ा संभलकर चल रहा है। इराक युद्ध के बाद ब्रिटेन में 'पहले हमला करने' की नीति पर काफी सवाल उठे थे। इसलिए अब ब्रिटेन चाहता है कि कोई भी सैन्य कदम उठाने से पहले कानूनी मंजूरी और अंतरराष्ट्रीय समर्थन साफ हो। वहीं अमेरिका सुरक्षा खतरे का हवाला देकर जल्दी और सख्त कदम उठाने के पक्ष में रहता है। 2. अमेरिका चागोस आइलैंड्स को लेकर नाराज दूसरा मुद्दा चागोस द्वीप समूह का है। चागोस आइलैंड्स और खासकर डिएगो गार्सिया रणनीतिक रूप से बहुत अहम जगह है। ब्रिटेन, मॉरीशस के साथ समझौता कर रहा है, लेकिन अमेरिका को लगता है कि इससे हिंद महासागर में उसकी पकड़ कमजोर हो सकती है। 3. अमेरिकी की सख्त विदेशी नीति तीसरी वजह दोनों देशों की अंदरूनी राजनीति है। अमेरिका में मौजूदा सरकार की विदेश नीति काफी सख्त और सौदेबाजी वाली मानी जा रही है। यानी वह हर मुद्दे को फायदे-नुकसान के नजरिए से देखती है। दूसरी तरफ, ब्रेक्सिट के बाद ब्रिटेन दुनिया को यह दिखाना चाहता है कि वह कानून और अंतरराष्ट्रीय नियमों का पालन करने वाला देश है। 4. ग्रीनलैंड के मुद्दे पर भी दोनों देशों में मतभेद ग्रीनलैंड के मुद्दे पर भी ब्रिटेन और अमेरिका की सोच में बड़ा फर्क है। ट्रम्प ने जब ग्रीनलैंड को खरीदने की इच्छा जताई थी, तब यूरोप के कई देशों की तरह ब्रिटेन ने भी इस पर हैरानी जताई थी। ब्रिटेन ने सीधे तौर पर अमेरिका का विरोध नहीं किया, लेकिन उसने साफ संकेत दिए कि वह डेनमार्क की संप्रभुता और अंतरराष्ट्रीय नियमों का सम्मान करता है।
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