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    ब्रह्मेश्वर मुखिया की पोती का UPSC में सिलेक्शन,दावा कितना सही:UP की आकांक्षा बोली- 301वीं रैंक मेरी; बिहार की आकांक्षा के 2 रोल नंबर

    19 hours ago

    बिहार की रणवीर सेना वाले ब्रह्मेश्वर सिंह उर्फ मुखिया की पोती आकांक्षा सिंह के UPSC पास करने के दावे पर विवाद हो गया है। पटना AIIMS से MBBS करने वाली गाजीपुर की आकांक्षा सिंह और आरा वाली आकांक्षा दोनों ने 301वीं रैंक पर दावा किया है। भास्कर ने UP की आकांक्षा और बिहार की आकांक्षा दोनों से बात की। दोनों के एडमिट कार्ड को टटोला। भास्कर की पड़ताल में ब्रह्मेश्वर सिंह उर्फ मुखिया की पोती आकांक्षा सिंह के एडमिट कार्ड में 2 अलग-अलग रोल नंबर मिले। पढ़िए दोनों आकांक्षा के दावों में क्या सच्चाई है… सबसे पहले बिहार की आकांक्षा की 2 तस्वीरें देखिए सबसे पहले UP की आकांक्षा की कहानी इस मामले में उत्तर प्रदेश के गाजीपुर की रंजीत सिंह की बेटी आकांक्षा ने दैनिक भास्कर को बताया कि उसने 0856794 रोल नंबर से अगस्त 2025 को मेंस का एग्जाम दिया था। 4 फरवरी 2026 को इंटरव्यू दिया था। मुझे क्लियर है कि यह रिजल्ट मेरा है, आप मेरे एडमिट कार्ड पर अंकित कोड या रोल नंबर से जांच कर सकते हैं। यूपीएससी की साइट पर कोई डाउट नहीं है। मीडिया में मिस इनफॉरमेशन हुआ है। पूरा मामला क्लियर हो चुका है कि ये रिजल्ट मेरा है। आरा की रहने वाली आकांक्षा को लगता है कि रिजल्ट उसका है तो सामने आकर इस बात का खंडन करें और प्रूफ के साथ दिखाएं। मुझे नहीं पता कि आरा की आकांक्षा ने किस आधार पर रिजल्ट देखा है। मैंने इसी रोल नंबर से मेंस समेत तीनों टेस्ट दिए हैं। मेरे पिता हर बार मुझे एग्जाम दिलवाते हैं। जब मैंने फॉर्म भरा था तब मुझे यह रोल नंबर मिला था। आकांक्षा ने बताया कि पटना AIIMS से उन्होंने MBBS, MS की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद UPSC की तैयारी में जुट गईं। दूसरे अटेम्प्ट में उन्होंने इसे क्लियर किया। अब बिहार की आकांक्षा की कहानी समझिए ब्रह्मेश्वर मुखिया की पोती आकांक्षा सिंह से दैनिक भास्कर ने बातचीत की। हमने उनसे भी एडमिट कार्ड मांगा। एडमिट कार्ड में दिए गए QR कोड को स्कैन करने के बाद आकांक्षा का रोल नंबर 0856569 आया। जबकि आकांक्षा जिस 301वीं रैंक पर दावा कर रही हैं, उस कैंडिडेट का रोल नंबर 0856794 है। वहीं, वाराणसी की रहने वाली आकांक्षा सिंह ने भी अपना एडमिट कार्ड दैनिक भास्कर को उपलब्ध कराया। जब उनके एडमिट कार्ड के QR कोड को स्कैन किया गया तो रोल नंबर 0856794 दिखा, जिसकी रैंक 301वीं है। इस बारे में भोजपुर की आकांक्षा से बातचीत की तो उन्होंने माना कि मेरा रोल नंबर 0856569 ही है, अब ये गड़बड़ी मेरी नहीं UPSC की है। एडमिट कार्ड पर उठते सवाल अब जानिए रिजल्ट पर आकांक्षा और उनका परिवार क्या कहता है आकांक्षा भोजपुर जिले के अगिआंव प्रखंड के खोपीरा गांव की रहने वाली हैं। हालांकि, उनका परिवार आरा शहर के कतीरा मोहल्ले में रहता है। आकांक्षा की प्रारंभिक शिक्षा आरा के कैथोलिक मिशन स्कूल से हुई। उन्होंने साल 2017 में मैट्रिक की परीक्षा दी और 80 प्रतिशत नंबर्स लाए। साल 2019 में इंटरमीडिएट (विज्ञान) की परीक्षा में 81 प्रतिशत अंक प्राप्त किए। आगे की पढ़ाई जारी रखते हुए साल 2022 में इंग्लिश से ग्रेजुएशन किया, जिसमें 64 प्रतिशत मार्क्स के साथ वो फर्स्ट आईं। दैनिक भास्कर से बातचीत में आकांक्षा ने बताया, मेरा जीवन बेहद सादगीपूर्ण रहा है और मैंने सीमित संसाधनों के बीच रहकर कड़ी मेहनत और लगन से ये मुकाम हासिल किया है। मेरे पिता कुमार इंदू भूषण सिंह किसान हैं और अखिल भारतीय राष्ट्रवादी किसान संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं, जबकि मां रिंकू देवी हाउस वाइफ हैं। परिवार में एक छोटा भाई हर्ष भूषण भी है, जो छत्तीसगढ़ के कलिंगा में बीटेक की पढ़ाई कर रहा है। सफलता का पहला श्रेय मम्मी को, मेरे लिए काफी स्ट्रगल किया आकांक्षा ने कहा, अपनी सफलता का पहला श्रेय मम्मी को दूंगी। उन्होंने मेरे लिए पूरा स्ट्रगल किया है। मैंने नर्सरी से लेकर 12 वीं तक कैथोलिक हाई स्कूल से पढ़ाई पूरी की है। स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद अगस्त 2022 में दिल्ली चली गई और वही से कोचिंग और इसके अलावा 8 से 10 घंटे रेगुलर पढ़ाई कर इस मुकाम को हासिल किया है। आकांक्षा ने बताया कि मैं शुरू से ही आईएफएस अधिकारी बनना चाहती थी। मेरे प्रेरणा बाबा स्वर्गीय ब्रह्मेश्वर मुखिया ही रहे हैं। उनका सपना था कि उनके घर से एक आईएएस निकले। मेरा सब्जेक्ट ऑप्शनल PSIR रहा है। अपाला मिश्रा ने मुझे बहुत मोटिवेट किया है। उन्होंने भी IFS ही जॉइन किया है। उन्हें देखकर काफी अच्छा लगता था। दूसरी बार में मैंने यूपीएससी पास किया है। 2024 में मैंने पहला एग्जाम दिया था लेकिन क्लियर नहीं हुआ था। भोजपुर से भोजपुरी को लेकर पैनल ने पूछा सवाल आकांक्षा ने बताया कि इंटरव्यू में भोजपुर से भोजपुरी को लेकर एक सवाल पूछा गया था कि कला के क्षेत्र में किसे पद्म श्री पुरस्कार दिया गया है? मैंने जवाब दिया कि भोजपुर से भरत सिंह भारती जी को ये सम्मान मिला है। फिर उन्होंने मेरे फेवरेट क्रिकेटर के बारे में पूछा, तब मैंने विराट कोहली के बारे में बताया। दादा ब्रह्मेश्वर मुखिया मैथ्स पढ़ाते थे आकांक्षा ने कहा कि मेरे दादा का सपना आज पूरा हुआ है। ब्रह्मेश्वर मुखिया मेरे दादा हैं, इससे बड़े गर्व की बात कुछ और नहीं हो सकती। आज जहां भी होंगे, वहां काफी खुश होंगे। जब मेरे बाबा थे, तब मैं छठी क्लास में पढ़ती थी। वे भी मुझे बेसिक पढ़ाई की जानकारी देते थे। मुझे हमेशा भरोसा दिलाते थे कि लाइफ में तुम कुछ बड़ा करोगी। सुबह 4 उठाकर बाबा पढ़ाई करवाते थे। मैथ्स की तैयारी कराते थे। आकांक्षा के पिता बोले- मैं चाहता था कि बेटी IIT करे आकांक्षा के पिता इंदू भूषण ने कहा कि मेरी बेटी ने यूपीएससी की परीक्षा पास कर ली है। ये काफी बड़ी खुशी है। मेरे पिता ब्रह्मेश्वर मुखिया कहते थे कि जो भी करना है, उसमें सबसे आगे रहना है। ये मैं अक्सर बेटी से कहता रहता था। मेरा जीवन संघर्ष में गुजरा है। मैंने इस संघर्ष में खुद को ढाल पाया। मैंने इसी बीच बेटी को काफी मोटिवेट भी किया। बेटी बचपन से पढ़ाई में तेज थी। 12वीं तक मैथ्स अच्छा रहा, 100 में से 100 लाती थी। बेटी घर के काम में भी हाथ बंटाती है। घर का ऐसा कोई काम नहीं है, जो बेटी नहीं कर पाती। मां रिंकू देवी बोलीं- बेटी की सफलता में बाबूजी का भी हाथ आकांक्षा की मां रिंकू देवी ने कहा कि मेरा सपना था कि बेटी अच्छा करे। मैं कहती थी कि तुम बीटेक कर लो, ताकि जल्दी से कमाओ, लेकिन बेटी ने कहा कि नहीं मुझे यूपीएससी ही करना है। काम के लिए भी मैं कहती थी, ये भी बोलती थी कि कुछ भी करोगी तो खाना तो बनाना ही पड़ेगा, तो बेटी कहती थी कि नहीं मैं कुछ ऐसा करूंगी कि खाना ही न बनाना पड़े। पूरे परिवार को पैसे के लिए काफी संघर्ष करना पड़ा। लेकिन बाबूजी (ब्रह्मेश्वर मुखिया) की कृपा है। अब जानिए आकांक्षा के दादा और रणवीर सेना चीफ ब्रह्मेश्वर मुखिया के बारे में भोजपुर जिले के खोपीरा गांव में रामबालक सिंह के घर 13 मार्च 1947 को जन्में ब्रह्मेश्वर सिंह बिहार में जातिगत लड़ाई का चर्चित चेहरा बन गए। साल 1960 में पंचायती राज आया तो र्निविरोध मुखिया चुन लिए गए, 30 साल तक खोपीरा के मुखिया रहे। टाइटिल मुखिया का मिला, पहचान ब्रह्मेश्वर मुखिया बन गई। नक्सली संगठनों और बड़े किसानों के बीच खूनी संघर्षों में हथियार उठाया और बड़े आंदोलन का बिगुल फूंक दिया। 1994 में बनाई थी रणवीर सेना साल 1994 में रणवीर सेना का गठन किया, यह ऊंची जाति के जमींदारों की प्राइवेट आर्मी कही जाती थी। ब्रह्मेश्वर मुखिया ने कम समय में बिहार में बड़ा जनाधार तैयार कर लिया। इस बीच मुखिया और उनकी सेना पर दर्जनों बार नरसंहार का आरोप लगा। वह 9 साल के लिए जेल भी गए, लेकिन पहले बेल मिली, फिर बरी हो गए। 1995 में बिहार सरकार ने रणवीर सेना पर बैन लगाया बिहार सरकार ने जुलाई 1995 में रणवीर सेना पर प्रतिबंध लगा दिया। 2005 में नीतीश कुमार की सरकार आने के बाद बिहार में कानून-व्यवस्था की स्थिति सुधरने लगी। नक्सल आंदोलन कमजोर पड़ने लगा। इस बारे में सीनियर जर्नलिस्ट प्रियदर्शी रंजन बताते हैं, ‘2005 के बाद रणवीर सेना का कोई इतिहास आपको नहीं मिलेगा।’ ‘सेना का मकसद पूरा होने लगा, तो उसकी प्रासंगिकता भी खत्म होने लगी। 1 जून 2012 को आरा में ब्रह्मेश्वर मुखिया की हत्या ने एक बार फिर पूरे बिहार को हिला दिया।’ 2012 में मॉर्निंग वॉक के दौरान हुई थी हत्या जनाधार और राजनीतिक द्वेष में 1 जून 2012 को आरा के कतिरा मोड़ पर मार्निंग वॉक के दौरान 70 साल की उम्र में ब्रह्मेश्वर मुखिया को गोलियों से छलनी कर दिया था। इस घटना में आरा से लेकर पटना तक आक्रोश की आग में जलने लगा। घटना ऐसी कि बिहार पुलिस को एक साल में कोई सुराग नहीं मिला और सीबीआई को तह तक पहुंचने में 10 साल लग गए। तब के DGP अभयानंद याद करते हैं, ‘ब्रह्मेश्वर मुखिया की शवयात्रा में हालात संभालने के दौरान किसी नेता का मेरे पास फोन नहीं आया था। मुखिया की हत्या के साथ ही रणवीर सेना खत्म हो गई। उसका पूरा संगठन बिखर गया।’
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