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    आदित्य धर की लिखी स्क्रिप्ट्स चुराकर हिट फिल्में बनीं:शूटिंग से पहले कई प्रोजेक्ट बंद हुए, डिस्लेक्सिया बीमारी को हराकर बने बॉलीवुड के धुरंधर

    8 hours ago

    डिस्लेक्सिया जैसी गंभीर बीमारी, पढ़ाई में कमजोरी और बार-बार टूटते सपनों के बावजूद आदित्य धर ने हार नहीं मानी। मुंबई आकर उन्होंने लंबे समय तक संघर्ष किया। कभी स्क्रिप्ट चोरी हुईं, तो कभी फिल्में शूटिंग से ठीक पहले बंद हो गईं। कई बार लगा कि अब सफर खत्म हो गया, लेकिन उन्होंने हर बार खुद को संभाला और एक कोशिश और की। उनकी मेहनत रंग लाई जब ‘उरी: द सर्जिकल स्ट्राइक’ रिलीज हुई और ब्लॉकबस्टर साबित हुई। इस फिल्म ने उन्हें रातोंरात पहचान दिला दी। इसके बाद उन्होंने बड़े स्तर पर काम शुरू किया और खुद को एक मजबूत फिल्ममेकर के रूप में स्थापित किया। हाल ही में आई धुरंधर ने उनके करियर को नई ऊंचाई दी है, जिसे उनकी अब तक की सबसे बड़ी फिल्मों में माना जा रहा है। आज की सक्सेस स्टोरी में आइए जानते हैं आदित्य धर के करियर और निजी जीवन से जुड़ी कुछ और बातें.. मां की कला ने बनाया स्टोरीटेलर मेरी मां दिल्ली यूनिवर्सिटी के म्यूजिक और फाइन आर्ट्स फैकल्टी की डीन थीं और एक क्लासिकल म्यूजिशियन भी। हमारे घर में हमेशा कला, संगीत और थिएटर का माहौल रहा। बड़े-बड़े कलाकार घर आते थे, हम प्ले देखने जाते थे, और क्लासिकल म्यूजिक सुनना रोजमर्रा का हिस्सा था। इसी माहौल ने मुझे कहानियों को महसूस करना सिखाया। मैं पढ़ाई में भले कमजोर था, लेकिन कला को समझने और उससे जुड़ने में हमेशा आगे रहा। यही वजह है कि मुझे हमेशा लगता रहा कि मेरी असली जगह यहीं है। कहानी कहने में, किरदारों को जीने में और एक इमोशनल कनेक्शन बनाने में। मुंबई आने का सफर और डिस्लेक्सिया से जंग 5 सितंबर 2006 को मैं मुंबई आया था। पीछे मुड़कर देखता हूं तो लगता है कि मेरा यहां तक पहुंचना किसी चमत्कार से कम नहीं है। मैं सीवियरली डिस्लेक्सिक था, पढ़ाई में बेहद कमजोर। आज भी अगर मुझे कुछ पढ़ना होता है तो दो-तीन पेज पढ़ने में पूरा दिन लग जाता है। ऐसे में इस इंडस्ट्री में राइटर और डायरेक्टर बनना लगभग नामुमकिन जैसा था। लेकिन मेरे अंदर कहानियों को समझने और महसूस करने की एक अलग ही क्षमता थी। मैंने हमेशा खुद को कमी नहीं, बल्कि एक अलग नजरिए के तौर पर देखा। शायद यही वजह रही कि मैं लिखने और कहानी कहने की तरफ खिंचता चला गया, भले ही पारंपरिक पढ़ाई में मैं पीछे रह गया। गीतकार के तौर पर शुरुआत और शुरुआती काम बहुत कम लोग जानते हैं कि मैंने अपने करियर की शुरुआत गीत लिखने से की थी। डायरेक्टर कबीर खान की फिल्म ‘काबुल एक्सप्रेस’ के लिए मैंने गाना लिखा, जो मेरे करियर का पहला बड़ा मौका था। इसके अलावा मैंने ‘बूंद’ नाम की एक शॉर्ट फिल्म के लिए स्टोरी, स्क्रीनप्ले और डायलॉग लिखे, जिसे नेशनल अवॉर्ड भी मिला। यह मेरे लिए बहुत बड़ा आत्मविश्वास देने वाला अनुभव था। उस समय मैं सिर्फ सीख रहा था। डायरेक्शन, राइटिंग, असिस्टिंग, सब कुछ एक साथ। मेरे लिए हर प्रोजेक्ट एक स्कूल था, जहां मैं खुद को बेहतर बना रहा था। ‘आक्रोश’ से शुरुआत और इंडस्ट्री की पहली बड़ी सीख मेरी शुरुआती पहचान डायरेक्टर प्रियदर्शन की फिल्म ‘आक्रोश’ से बनी। जहां मैंने डायलॉग लिखे और साथ ही डायरेक्शन व कास्टिंग में भी असिस्ट किया। मैं हमेशा मानता था कि अगर किसी प्रोजेक्ट में घुसो तो पूरी ईमानदारी और मेहनत के साथ घुसो। उसी दौरान स्क्रीनप्ले राइटर रॉबिन दा ने मुझे एक बात कही जो आज भी मेरे साथ है। इस इंडस्ट्री में बहुत कम लोगों की ‘पीठ बोलती है’, और अगर तुम्हारी पीठ बोलती है तो बस खुद को बदलना मत। यह बात मेरे लिए किसी मंत्र से कम नहीं थी। मैंने इसे हमेशा अपने काम में उतारने की कोशिश की। यही वजह रही कि मैं हर छोटे-बड़े काम को पूरी जिम्मेदारी के साथ करता गया, चाहे वो डायलॉग राइटिंग हो, असिस्टिंग हो या कास्टिंग में मदद करना। बार-बार असफलताएं और स्क्रिप्ट चोरी का दर्द मेरे करियर में कई बार ऐसा हुआ कि फिल्म बनने के आखिरी स्टेज पर रुक गई। कई बार मेरी लिखी स्क्रिप्ट्स मुझसे चुरा ली गईं और उन्हीं पर बड़ी-बड़ी हिट फिल्में बन गईं। यह बहुत ही दर्दनाक अनुभव था। उस समय लगता था कि अब सब खत्म हो गया है। लेकिन हर बार किसी न किसी ने मुझे संभाला। कभी प्रियदर्शन , कभी विशाल भारद्वाज, जिन्होंने मुझे रुकने और कोशिश करते रहने की सलाह दी। फवाद-कैटरीना की फिल्म बनी-बनते रह गई 2016 में मैं अपनी फिल्म ‘रात बाकी’ बनाने वाला था। इस फिल्म में फवाद खान और कैटरीना कैफ थे। फिल्म को धर्मा प्रोडक्शंस प्रोड्यूस कर रहा था और फॉक्स स्टार स्टूडियोज इसे फाइनेंस कर रहा था। सब कुछ सेट था, हम शूटिंग शुरू करने वाले थे, लेकिन तभी उरी अटैक हुआ। इसके बाद राजनीतिक माहौल बदल गया और पाकिस्तानी एक्टर्स को लेकर विवाद शुरू हो गया। धर्मा ऑफिस के बाहर विरोध हुआ और आखिरकार फिल्म रुक गई। यह मेरे लिए एक और बड़ा झटका था, क्योंकि एक बार फिर मेरी फिल्म बनते-बनते रुक गई। परिवार का साथ और मां की आस्था मेरे परिवार ने हमेशा मेरा साथ दिया, खासकर मेरे बड़े भाई और मेरी मां। जब भी मेरी फिल्म रुकती थी, मैं टूट जाता था, लेकिन मेरी मां हमेशा कहती थीं- “भगवान तुम्हें टेस्ट कर रहा है, जब देगा तो इतना देगा कि तुम जिंदगी भर याद रखोगे।” मेरी मां ने हर मंदिर में जाकर मेरे लिए प्रार्थना की। ‘उरी’ की शुरुआत: एक आइडिया से जुनून तक ‘रात बाकी’ रुकने के बाद जब उरी अटैक और सर्जिकल स्ट्राइक की खबर आई, तो मेरे अंदर एक नई कहानी जन्मी। मैंने सोचा कि इस पर फिल्म बननी चाहिए। मैंने खुद रिसर्च शुरू की, जर्नलिस्ट्स, आर्मी ऑफिसर्स और डिफेंस एक्सपर्ट्स से मिला। कोई प्रोड्यूसर नहीं था, मैं अपनी सेविंग्स से यह सब कर रहा था। डर भी था कि अगर यह भी नहीं बना तो क्या होगा, लेकिन खुद को साबित करने का एक जुनून था। 12 दिनों की मेहनत और फिल्म को मिली मंजूरी 6 महीने की रिसर्च के बाद मैंने खुद को कमरे में बंद कर लिया और 12 दिनों में पूरी स्क्रिप्ट लिख दी। यह एक पागलपन जैसा जुनून था। स्क्रिप्ट मेरे मैनेजर के पास गई और फिर रॉनी स्क्रूवाला तक पहुंची। उन्होंने फ्लाइट में स्क्रिप्ट पढ़ी और लैंड करते ही कहा- “We are doing this film no matter what.” सालों का इंतजार कुछ घंटों में खत्म हो गया। यह मेरे जीवन का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट था। ‘उरी’ की सफलता और जिंदगी की सबसे बड़ी सीख जब ‘उरी: द सर्जिकल स्ट्राइक’ रिलीज हुई, तो उसे जबरदस्त प्यार मिला। यह फिल्म सिर्फ एक हिट नहीं थी, बल्कि मेरे लिए एक इमोशनल जर्नी का अंत और नई शुरुआत थी। इंडियन आर्मी से लेकर आम जनता तक, सभी ने इसे सराहा। मुझे एहसास हुआ कि टैलेंट जरूरी है, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है मेहनत, ईमानदारी, धैर्य और लोगों का आशीर्वाद। आज मैं पूरी तरह मानता हूं कि जो भी होता है, आखिरकार अच्छे के लिए ही होता है। बस आपको आखिरी तक डटे रहना होता है। ‘उरी’ के बाद बदली पहचान और करियर का नया दौर आदित्य धर के लिए ‘उरी: द सर्जिकल स्ट्राइक’ की सफलता सिर्फ एक हिट फिल्म नहीं थी, बल्कि उनके करियर का निर्णायक मोड़ साबित हुई। इस फिल्म के बाद वह एक भरोसेमंद डायरेक्टर के रूप में स्थापित हो गए। इंडस्ट्री में उनकी पहचान एक ऐसे फिल्ममेकर की बनी, जो कंटेंट और इमोशन को बड़े पैमाने पर पेश कर सकता है। ‘उरी’ की सफलता के बाद उनसे उम्मीदें काफी बढ़ गईं, लेकिन उन्होंने जल्दबाजी में कोई फैसला नहीं लिया। उन्होंने समय लेकर अगली दिशा तय की, ताकि उनका काम सिर्फ बॉक्स ऑफिस तक सीमित न रहकर क्वालिटी और प्रभाव के लिए भी याद रखा जाए। प्रोडक्शन की तरफ कदम और B62 स्टूडियोज की शुरुआत डायरेक्शन में सफलता के बाद आदित्य धर ने प्रोडक्शन की दुनिया में भी कदम रखा और B62 Studios की स्थापना की। इस बैनर के जरिए उनका उद्देश्य था नई और दमदार कहानियों को मंच देना। एक फिल्ममेकर के तौर पर उन्होंने समझा कि अच्छी कहानियों को सही सपोर्ट और प्लेटफॉर्म मिलना कितना जरूरी है। B62 स्टूडियोज के माध्यम से उन्होंने ऐसे प्रोजेक्ट्स पर काम करना शुरू किया, जो कंटेंट-ड्रिवन हों और दर्शकों के साथ गहरा जुड़ाव बना सकें। यह उनके करियर का एक अहम विस्तार था, जहां वह सिर्फ कहानी कहने तक सीमित नहीं रहे, बल्कि कहानियों को आकार देने और उन्हें दर्शकों तक पहुंचाने की पूरी प्रक्रिया का हिस्सा बने। बतौर प्रोड्यूसर: नई फिल्मों और विषयों पर फोकस प्रोड्यूसर के तौर पर आदित्य धर ने अलग-अलग विषयों पर काम करने की कोशिश की। उनके नाम से ‘आर्टिकल 370’ और ‘बारामूला’ जैसे प्रोजेक्ट्स जुड़े रहे,जो सामाजिक और संवेदनशील मुद्दों को सामने लाने की कोशिश करते हैं। इन फिल्मों के जरिए उन्होंने यह दिखाने का प्रयास किया कि वह सिर्फ देशभक्ति या एक्शन जॉनर तक सीमित नहीं हैं, बल्कि विविध विषयों पर भी उनकी पकड़ है। एक प्रोड्यूसर के तौर पर उनकी सोच साफ रही, ऐसी कहानियां बनाना जो दर्शकों को सोचने पर मजबूर करें और साथ ही मनोरंजन भी करें। बड़े प्रोजेक्ट्स की योजना और ‘द इम्मॉर्टल अश्वत्थामा’ ‘उरी’ के बाद आदित्य धर ने बड़े स्केल के प्रोजेक्ट्स पर भी काम शुरू किया, जिनमें ‘द इम्मॉर्टल अश्वत्थामा’ प्रमुख रहा। इस फिल्म में विक्की कौशल को कास्ट किया गया था और इसे एक बड़े विजुअल स्पेक्टेकल के रूप में प्लान किया गया था। हालांकि यह प्रोजेक्ट कई कारणों से आगे-पीछे होता रहा, लेकिन इसने यह जरूर दिखाया कि आदित्य धर बड़े और इंटरनेशनल लेवल के सिनेमा की तरफ बढ़ना चाहते हैं। यह उनके विजन का विस्तार था, जहां वह भारतीय कहानियों को वैश्विक स्तर पर ले जाने की सोच रखते हैं। सही स्क्रिप्ट का इंतजार और क्रिएटिव संतुलन ‘उरी’ जैसी बड़ी सफलता के बाद अक्सर फिल्ममेकर्स जल्दी-जल्दी फिल्में बनाने लगते हैं, लेकिन आदित्य धर ने इस रास्ते को नहीं चुना। उन्होंने समय लेकर स्क्रिप्ट्स पर काम किया और सिर्फ उन्हीं प्रोजेक्ट्स को आगे बढ़ाया, जिन पर उन्हें पूरा भरोसा था। उनके लिए यह जरूरी था कि अगली फिल्म भी उतनी ही ईमानदार और प्रभावशाली हो। इस दौरान उन्होंने कई आइडियाज पर काम किया, रिसर्च किया और अपनी कहानी कहने की शैली को और मजबूत किया। यह फेज उनके लिए क्रिएटिव ग्रोथ का समय था, जहां उन्होंने खुद को और बेहतर बनाने पर ध्यान दिया। टीम और कास्टिंग के प्रति स्पष्ट सोच आदित्य धर की फिल्ममेकिंग का एक अहम हिस्सा उनकी कास्टिंग अप्रोच है। ‘उरी’ के दौरान ही उन्होंने यह साफ कर दिया था कि वह स्टारडम से ज्यादा परफॉर्मेंस को महत्व देते हैं। आगे भी उन्होंने इसी सोच को बरकरार रखा। उनकी कोशिश रहती है कि हर एक्टर अपने किरदार के साथ न्याय करे और पूरी ईमानदारी से काम करे। एक डायरेक्टर और प्रोड्यूसर के तौर पर वह टीमवर्क में विश्वास रखते हैं और अपने साथ ऐसे लोगों को जोड़ते हैं, जो कहानी के प्रति उतने ही समर्पित हों जितने वह खुद हैं। इंडस्ट्री में मजबूत पकड़ और कंटेंट-ड्रिवन सिनेमा ‘उरी’ के बाद आदित्य धर ने इंडस्ट्री में अपनी एक अलग पहचान बनाई। एक ऐसे फिल्ममेकर की, जो कंटेंट को प्राथमिकता देता है। उन्होंने यह साबित किया कि अगर कहानी मजबूत हो, तो वह बड़े स्तर पर भी काम कर सकती है। उनके काम ने यह भी दिखाया कि देशभक्ति और रियल-लाइफ इंस्पायर्ड कहानियां दर्शकों को गहराई से प्रभावित करती हैं। इसी कारण उनकी फिल्मों और प्रोजेक्ट्स को लेकर दर्शकों में एक अलग उत्सुकता बनी रहती है। आने वाले प्रोजेक्ट्स और भविष्य की दिशा आदित्य धर का फोकस आगे भी बड़े और अर्थपूर्ण सिनेमा पर है। वह ऐसे प्रोजेक्ट्स पर काम करना चाहते हैं, जो सिर्फ मनोरंजन ही न करें, बल्कि दर्शकों पर स्थायी प्रभाव छोड़ें। चाहे वह बड़े बजट की फिल्में हों या कंटेंट-ड्रिवन प्रोजेक्ट्स, उनका लक्ष्य हमेशा यही रहता है कि हर कहानी में एक सच्चाई और गहराई हो। इस तरह, ‘उरी’ के बाद आदित्य धर का सफर सिर्फ एक सफल डायरेक्टर तक सीमित नहीं रहा, बल्कि वह एक ऐसे फिल्ममेकर के रूप में उभरे हैं, जो लगातार खुद को नया और बेहतर बनाने की कोशिश कर रहे हैं। ‘धुरंधर’: करियर की सबसे बड़ी फिल्म की शुरुआत आदित्य धर के करियर में ‘धुरंधर’ एक बेहद अहम मोड़ बनकर सामने आई। ‘उरी’ की सफलता के बाद जिस तरह की उम्मीदें उनसे जुड़ी थीं, ‘धुरंधर’ उसी स्तर से आगे जाने की कोशिश थी। इस फिल्म को उन्होंने सिर्फ एक प्रोजेक्ट की तरह नहीं, बल्कि एक बड़े विजन के तौर पर तैयार किया। कहानी के स्तर पर यह फिल्म स्केल, इमोशन और ड्रामा,तीनों का मिश्रण थी। आदित्य ने इस प्रोजेक्ट पर काफी समय लगाया, ताकि यह सिर्फ एक कमर्शियल फिल्म न रह जाए, बल्कि दर्शकों के दिल में भी अपनी जगह बना सके। ‘धुरंधर’ की मेकिंग: स्केल, रिसर्च और डिटेलिंग ‘धुरंधर’ की खास बात इसकी मेकिंग अप्रोच रही। आदित्य धर ने ‘उरी’ की तरह ही इस फिल्म में भी रिसर्च और डिटेलिंग पर खास ध्यान दिया, लेकिन इस बार स्केल और भी बड़ा था। फिल्म के हर पहलू,चाहे वह लोकेशन हो, एक्शन हो या इमोशनल सीक्वेंस, सबको बड़े स्तर पर डिजाइन किया गया। उनका मानना रहा है कि दर्शक अब सिर्फ कहानी नहीं, बल्कि एक पूरा अनुभव देखने आते हैं। यही वजह रही कि ‘धुरंधर’ को तकनीकी और विजुअल दोनों ही स्तर पर मजबूत बनाने की कोशिश की गई। कास्टिंग और परफॉर्मेंस: वही पुराना भरोसा ‘धुरंधर’ में भी आदित्य धर ने अपनी वही कास्टिंग फिलॉसफी अपनाई, स्टारडम से ज्यादा परफॉर्मेंस पर भरोसा। उनकी कोशिश रही कि हर एक्टर अपने किरदार को पूरी तरह जीए। ‘उरी’ की तरह यहां भी उन्होंने ऐसे कलाकारों को चुना जो कहानी के साथ न्याय कर सकें और अपनी पूरी मेहनत झोंक दें। इस अप्रोच का फायदा यह हुआ कि फिल्म के किरदार ज्यादा रियल और कनेक्टिंग लगे। आदित्य का मानना है कि अगर कास्टिंग सही हो, तो आधी फिल्म वहीं बन जाती है। ‘धुरंधर 2’ की रिलीज और धमाकेदार शुरुआत 19 मार्च को ‘धुरंधर 2’ सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी है और पहले ही दिन फिल्म को जबरदस्त रिस्पॉन्स मिल रहा है। एडवांस बुकिंग से बनी हाइप अब ओपनिंग डे पर साफ नजर आ रही है। बड़े स्केल, दमदार एक्शन और मजबूत कहानी के साथ यह फिल्म दर्शकों को बांधे रखने में कामयाब दिख रही है। फ्रेंचाइजी का विस्तार और आगे की राह पहले पार्ट की सफलता के बाद ‘धुरंधर 2’ ने इस सीरीज को और मजबूत किया है। यह अब सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि एक बड़ी फ्रेंचाइजी बनती दिख रही है। शुरुआती प्रतिक्रियाओं को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि फिल्म ने उम्मीदों पर खरा उतरने की मजबूत शुरुआत कर दी है, और आगे ‘धुरंधर 3’ की संभावना भी बढ़ गई है। ________________________________________ पिछले हफ्ते की सक्सेस स्टोरी पढ़िए... वॉचमैन की नौकरी की, कभी धनिया बेची:फिल्मों में 1-2 मिनट के छोटे रोल किए; आज बॉलीवुड के सबसे दमदार अभिनेता बन गए नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी छोटे से कस्बे बुधाना से निकलकर बॉलीवुड तक का सफर तय करने वाले नवाजुद्दीन सिद्दीकी की कहानी संघर्ष, धैर्य और जुनून की मिसाल है। किसान परिवार में जन्मे नवाज ने बचपन सादगी और सीमित संसाधनों के बीच बिताया। केमिस्ट की नौकरी से लेकर दिल्ली में थिएटर और फिर मुंबई में छोटे-छोटे रोल करने तक, उनका सफर आसान नहीं रहा।पूरी खबर पढ़ें..
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